इन अदाओं का ज़माना भी है दीवाना क्या कहेगा

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शशी कुमार केसवानी

बॉलीवुड में कितने ही नायकों का दौर आया और गया। दिलीप कुमार हों या राजेश खन्ना सबका एक दौर था। यहां तक कि अब अमिताभ बच्चन का दौर भी लोगों को ढलता नजर आता है लेकिन बॉलीवुड की दुनिया में एक ऐसा अभिनेता भी है जिसने खुद को कभी उम्र के बंधन में बंधने नहीं दिया और वह है सदाबहार अभिनेता देवानंद। सदाबहार देवानंद का जलवा अब भी बरकरार है। वक्त की करवटें उनकी हस्ती पर अपनी सिलवटें नहीं छोड़ पाईं धर्मदेव आनंद, जो की देव आनन्द के नाम से प्रसिद्ध थे, का जन्म 26 सितम्बर 1923 में गुरदास पुर (जो अब नारोवाल जिला, पाकिस्तान में है) में हुआ उनके पिता किशोरीमल आनंद पेशे से वकील थे। उन्होंने गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर से अंग्रेजी साहित्य में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। देव आनंद के भाई, चेतन आनंद और विजय आनंद भी भारतीय सिनेमा में सफल निर्देशक थे। उनकी बहन शील कांता कपूर प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक शेखर कपूर की माँ है। देव आनंद काम की तलाश में मुंबई आए और उन्होंने मिलट्री सेंसर आॅफिस में 160 रुपए प्रति माह के वेतन पर काम की शुरुआत की! शीघ्र ही उन्हें प्रभात टॉकीज एक फिल्म हम एक हैं में काम करने का मौका मिला और पूना में शूटिंग के वक़्त उनकी दोस्ती अपने जमाने के सुपर स्टार गुरुदत्त से हो गई कुछ समय बाद अशोक कुमार के द्वारा उन्हें एक फिल्म में बड़ा ब्रेक मिला।

उन्हें बॉम्बे टॉकीज प्रोडक्शन की फिल्म जिÞद्दी में मुख्य भूमिका प्राप्त हुई और इस फिल्म में उनकी सहकारा थीं कामिनी कौशल, ये फिल्म 1948 में रिलीज हुई और सफल भी हुई। 1949 में देव आनंद ने अपनी एक फिल्म कम्पनी बनाई, जिसका नाम नवकेतन रखा गया, इस तरह अब वो फिल्म निर्माता बन गए। देव आनंद साहब ने अपने मित्र गुरुदत्त का डायरेक्टर के रूप में चयन किया और एक फिल्म का निर्माण किया, जिसका नाम था बाजी, ये फिल्म 1951 में प्रदर्शित हुई और काफी सफल हुई। इसके बाद देव साहब नें कुछ भूमिकाएं निभाई जो कुछ नकरात्मक शेड लिए थीं। जब राज कपूर की आवारा प्रदर्शित हुई, तभी देव आनंद की राही और आंधियां भी प्रदर्शित हुईं। इसके बाद आई टैक्सी ड्राईवर, जो हिट साबित हुई। इस फिल्म में इनके साथ थीं कल्पना कार्तिक, जिन्होंने देव साहब के साथ विवाह किया और 1956 में इन्हें एक पुत्र हुआ, जिसका नाम सुनील आनंद रखा गया। इसके बाद उनकी कुछ फिल्में आईं जैसे, मुनीम जी, सीआईडी और पेइंग गेस्ट, उसके बाद तो हर नौजवान उनके स्टाइल का दीवाना हो गया और उनका स्टाइल अपनाने की कोशिश करता। 1955 में उन्होंने उस जमाने के एक और सुपर स्टार दिलीप कुमार के साथ काम किया और फिल्म का नाम था इंसानियत।

1959 में उनको फिल्म काला पानी के लिए बेहतरीन कलाकार के पुरस्कार से नवाजा गया। इसके बाद उनके जीवन में सुरैय्या आईं, जिनके साथ उन्होंने 6 फिल्मों में काम किया। एक बार देव आनंद ने शूटिंग के दौरान सुरैया को पानी में डूबने से बचाया तब से वो उन्हें प्यार करने लगीं, लेकिन सुरैया की दादी धार्मिक कारणों से इनके रिश्ते के खिलाफ थीं। सुरैय्या आजीवन कुंवारी ही रहीं। 1965 में उनकी पहली रंगीन फिल्म प्रदर्शित हुई, जिसका नाम था गाइड, ये एक मशहूर लेखक आरके नारायण के उपन्यास पर आधारित थी, जिसका निर्माण उनके छोटे भाई विजय आनंद ने किया था, इस फिल्म में देव आनंद के साथ थीं वहीदा रहमान! ये फिल्म देव साहब की बेहतरीन फिल्मों में से एक है, जिसके बारे में कहा जाता है की अब दुबारा गाइड कभी नहीं बन सकती, ऐसी फिल्म सिर्फ एक बार ही बनती है। उसके बाद उन्होंने विजय आनंद के साथ मिल कर एक और फिल्म का निर्माण किया, जिसका नाम था ज्वेल थीफ, इसमें उनके साथ थीं, वैजयंती माला, तनूजा, अंजू महिन्द्रू और हेलेन। इसके बाद उनकी अगली फिल्म थी जॉनी मेरा नाम, जो उस समय सफलतम फिल्मों में से एक थी। 1970 में बतौर निर्देशक उनकी पहली फिल्म आई प्रेम पुजारी, जो सफल नहीं हुई, लेकिन अगले ही वर्ष उनके द्वारा निर्देशित फिल्म हरे राम हरे कृष्णा ने सफलता का स्वाद चखा। जीनत अमान ने “जेनिस” नाम की लड़की का किरदार निभाया, जो माता-पिता के तनाव से तंग आकर हिप्पियों के समूह में शामिल हो जाती है। इसी वर्ष उनकी एक और फिल्म तेरे मेरे सपने प्रदर्शित हुई, जिसमें उनके साथ थीं मुमताज, ये फिल्म एजे क्रोनिन के उपन्यास थी। इस फिल्म को उनके भाई विजय आनंद द्वारा निर्देशित किया गया था। जीनत अमान के बाद उनकी नयी खोज थी टीना मुनीम, जिनके साथ उन्होंने 1978 में फिल्म देस परदेस का निर्माण किया, ये भी उनकी एक सफल फिल्म थी।

राजनितिक दल नेशनल पार्टी आॅफ इंडिया का निर्माण
1977 में उन्होंने एक राजनितिक दल नेशनल पार्टी आॅफ इंडिया का निर्माण किया, जो की तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी के खिलाफ था, लेकिन ये राजनितिक दल ज्यादा समय तक नहीं रहा। देव आनंद की फिल्में उनके संगीत के कारण भी प्रसिद्ध है, उनकी फिल्मों का संगीत आज भी लोगों को मंत्र मुग्ध करता है। उन्होंने जिन संगीतकारों, लेखकों और गायकों के साथ काम किया उनमें से कुछ इस प्रकार हैं, शंकर-जयकिशन, ओपी नैयर, कल्याण जी- आनंद जी, सचिन देव बर्मन, राहुल देव बर्मन, लेखक: हसरत जयपुरी, मजरूह सुल्तानपुरी, नीरज, शैलेन्द्र, आनंद बख्शी, गायक: मोहम्मद रफी आदि।

देवानंद को अपने जीवन में पहली बार मोहब्बत का एहसास बीते जमाने की सुंदर अभिनेत्री सुरैया ने करवाया था, फिल्म ‘किनारे-किनारे’ की शूटिंग के दौरान दोनों की आंखे चार हुई थी। और वहीं से यह मोहब्बत परवान चढ़ी थी लेकिन हर बार की तरह इस प्यार की राह आसान नहीं थी, सुरैया मुस्लिम थीं, सो इस मोहब्बत में मजहब आड़े आ गया, उनकी नानी ने देव साहब को अपनाने से इंकार कर दिया था, सुरैया में इतनी ताकत नहीं थी कि वो अपने प्यार के आगे अपने घर को छोड़ सके, जिसका नतीजा ये हुआ कि उन्होंने देवानंद को मना कर दिया। देव साहब उस समय चोटिल तो बहुत हुए लेकिन जिंदगी में कभी भी कोई अफसोस ना करने वाले देवानंद ने सुरैया को छोड़कर जिंदगी में आगे बढ़ने का फैसला कर लिया। कल्पना के साथ देवानंद ने कई कामयाब फिल्में की। ‘मिस शिमला’ के नाम से विख्यात कल्पना कार्तिक बेहद हसीन और प्यारी थीं, कल्पना, देवानंद के बड़े भाई चेतन की पहली पत्नी की बहन थीं, कल्पना से शादी करने के बाद देव साहब को दो बच्चे नसीब हुए जिन्होंने उनकी जिंदगी में ऐसे रंग भरे जिसके आगे उन्हें फिर किसी और चीज की चाहत नहीं रही। लेकिन दिल से जवां देव साहब को उम्र के उस पड़ाव पर तीसरी बार मोहब्बत हुई, जिस समय उनके बेटे की उम्र 12 साल थी। फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ में साथ काम करते करते देव साहब को जीनत अमान का हुस्न भा गया। फिल्म ने सारे रिकार्ड तोड़े लेकिन जीनत ने देव साहब के दिल में जगह बना ली।

कहते हैं देव आनंद को अशोक कुमार की फिल्म ‘अछूत’ इतनी पसंद आई थी कि उन्होंने ऐक्टर बनने की ठान ली। देव आनंद ने अपने करियर में बहुत सारी ऐसी फिल्में छोड़ दी थीं जिन्होंने बाद में कई ऐक्टर्स के करियर बना दिए। देव आनंद को जंगली और तीसरी मंजिल आॅफर हुई थीं मगर उन्होंने ये दोनों ही फिल्में छोड़ दी थीं। बाद में इन दोनों फिल्मों ने शम्मी कपूर का करियर बना दिया था। इसी तरह अमिताभ बच्चन की पहली सुपरहिट फिल्म कही जाने वाली जंजीर भी पहले देव आनंद को आॅफर हुई थी। इसके बाद अशोक कुमार ने ही देव आनंद को फिल्म ‘जिद्दी’ में ब्रेक दिया था। जिस तरह दिलीप कुमार ट्रेजडी किंग के नाम से जाने जाते थे, वहीं देव आनंद रोमांस किंग के नाम से लोकप्रिय थे। अपनी डायलॉग डिलीवरी, अदाकारी, लुक्स और हेयरकट के अलावा देव अपने फैशन सेंस के लिए भी बहुत पॉपुलर थे। सफेद शर्ट के ऊपर काला कोट पहनना उनका सिग्नेचर स्टाइल बन गया था। लेकिन एक समय ऐसा आया जब उनके इस पहनावे पर कोर्ट ने बैन लगा दिया। साल 1958 में आई फिल्म ‘काला पानी’ में देव आनंद के सफेद शर्ट और काले कोट वाले लुक ने लड़कियों को ही नहीं बल्कि लड़कों को भी दीवाना बना दिया था। इसके बाद देव साहब के काले कोट पर बैन लगाने की कवायद भी शुरू हुई थी। इस बात का जिक्र देव आनंद के आॅटोबायोग्राफी में किया गया है। दरअसल, देव आनंद जब भी सफेद शर्ट के ऊपर काले रंग का कोट डालकर बाहर निकलते थे, तो लड़कियां उन्हें देखने के लिए इकट्ठा हो जाती थी। इतना ही नहीं बल्कि लड़कियां छत से कूदकर उन्हें देखने आ जाती थीं।
अपने बेहतरीन लुक के साथ देव का यूं सार्वजनिक रूप से बाहर आना लोगों की जान पर बन आई थी। मध्यप्रदेश के भोपाल नगर में 1997 में देव आनन्द अपने प्रशंसक के आमंत्रण पर आए थे। तब लाल परेड ग्राउण्ड पर राजधानी वासियों ने उनका हृदय से स्वागत किया था। सितम्बर 2007 में उनकी आत्मकथा रोमांसिंग विद लाइफ उनके जन्म दिवस के अवसर पर प्रदर्शित की गई, जहां भारत के प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह जी भी उपस्थित थे। देव आनन्द को अपनी मौत का आभास हो गया था। इसको जानने के बाद वह अंतिम समय बिताने इंग्लैंड चले गए थे, जहां 88 बरस की आयु में उन्होंने तीन दिसंबर 2011 को आखिरी सांस ली।
जय हो…

द्धिंश्र्क्क॰प् िंभ्द्धख्र् त्र्द़क्वय् ूवक्कद्भत्त्।क्कद्भल्
, ‘ना सुख है, ना दुख है, ना दीन है, ना दुनिया, ना इंसान, ना भगवान… सिर्फ मैं हूं, मैं हूं, मैं हूं’।
,ये आजादी की लड़ाई मेरे मर जाने से खत्म नहीं होगी… ये लड़ाई तो मेरे मर जाने के बाद शुरू होगी’।
,’जॉनी बुरे काम तो करता है लेकिन इमान के साथ’, ‘जिंदगी के दो हिस्से होते हैं.. एक सवाल दूसरा जवाब’।
,’जेल की दीवार को तोड़कर भाग जाना आसान है लेकिन प्यार और दोस्ती की दीवार को फांदना नामुमकिन है’।
,’जिस रोज एक चोर दूसरे चोर पर भरोसा नहीं करेगा, उस रोज भगवान भी अल्लाह मिया पे भरोसा नहीं करेगा’।
,’प्यार जब नफरत में बदल जाता है, तो खतरनाक हो जाता है’।