भोपाल गैस त्रासदी की 41वीं बरसी आज… आज भी जहन में ताज़ा हैं हादसे के जख्म -पहले कचरे से खतरा था, अब राख बनी सिरदर्द

0
70

TIO भोपाल

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में 2-3 दिसंबर 1984 की दरम्यिानी रात को कभी नहीं भुलाया जा सकता। एक ऐसी त्रासदी जिसने एक भयावह इतिहास रच दिया। मध्य प्रदेश को विश्व के सामने ला दिया। हादसे को गुजरे 41 साल का लंबा समय हो गया है, लेकिन चीख पुकार और लाशों के ढेर के साथ बीती उस काली रात के जख्म आज भी लोगों के जहन में ताजा हैं। पीडि़तों के पुनर्वास सहित दूसरे मुद्दों के बीच यह मामला इसलिये भी यथावत है क्योंकि पहले कचरे से खतरा था, अब इसकी राख सिरदर्द बन गई है। दरअसल जहरीले कचरे से निकली राख एक नई मुसीबत बन गई है। मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सामने 899 टन राख को ठिकाने लगाने की चुनौती है। यह राख यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से निकले कचरे को जलाने से बनी है। इस साल मई और जून में, पीथमपुर के एक ट्रीटमेंट प्लांट में 337 मीट्रिक टन जहरीला कचरा जलाया गया था। इस प्रक्रिया से 899 मीट्रिक टन राख और अवशेष निकले, जो मूल कचरे से लगभग तीन गुना ज्यादा थे। 55 दिन तक चली यह भस्मीकरण प्रक्रिया खत्म हुए कई महीने बीत चुके हैं, लेकिन यह राख अभी भी लीक-प्रूफ डिब्बों में एक शेड के अंदर रखी हुई है। लोगों की बढ़ी चिंताएं इस देरी से पर्यावरण संबंधी चिंताएं भी बढ़ गई हैं। पीथमपुर में निपटान का विरोध कर रहे स्थानीय समूह कह रहे हैं कि यह स्थल ऐसे खतरनाक कचरे को रखने के लिए बिल्कुल अनुपयुक्त है। पीथमपुर बचाओ समिति के संयोजक हेमंत हिरोले ने कहा, ‘यह भविष्य की पीढिय़ों के लिए परमाणु बम से कम नहीं है। हाई कोर्ट ने साफ कहा है कि यह स्थल असुरक्षित है। यहां निपटान नहीं होगा। सरकार को कोई और जगह ढूंढनी होगी।’ क्या हुआ था उस रात भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड नामक कंपनी के कारखाने से मिथाइलआइसोसाइनाइट (मिक) नामक जहरीली गैस का रिसाव हुआ था। इसका उपयोग कीटनाशक बनाने के लिए किया जाता था। मरने वालों के अनुमान पर विभिन्न स्त्रोतों की अपनी-अपनी राय होने से इसमें भिन्नता मिलती है। फिर भी पहले अधिकारिक तौर पर मरने वालों की संख्या 2,259 थी। मध्यप्रदेश की तत्कालीन सरकार ने 3,787 की गैस से मरने वालों के रुप में पुष्टि की थी। 2006 में सरकार द्वारा दाखिल एक शपथ पत्र में माना गया था कि रिसाव से करीब 558,125 सीधे तौर पर प्रभावित हुए और आंशिक तौर पर प्रभावित होने की संख्या लगभग 38,478 थी। 3900 तो बुरी तरह प्रभावित हुए एवं पूरी तरह अपंगता के शिकार हो गए।