श्रद्धांजलि. राजकुमार केसवानी

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रज़ा मावल सीनियर फ़ोटो जर्नलिस्ट

26 नवंबर 1950 को भोपाल की ज़रख़ेज़ सरज़मीन पर एक और शख्सियत ने जन्म लिया नाम राजकुमार केसवानी. राजकुमार केसवानी भोपाल के एक पड़े लिखे परिवार से तअल्लुक रखते थे जहा हिन्दी, उर्दू और इंग्लिश भाषाओ सहित हिंदोस्तानी संगीत की गंगा बहती है. आप के पिता मरहूम लक्ष्मण दास केसवानी जी भोपाल की जानी-मानी शख्सियत थे और जंगे आज़ादी के सिपाही थे !
राजकुमार केसवानी की पहली पहचान एक पढे -लिखे पत्रकार के रूप मे होती है.
{ पढ़ा लिखा पत्रकार मैने क्यों लिखा इसका ज़िक्र मे आगे करूंगा }


1968 मे कॉलेज पहुचते ही यह सफर स्पोर्ट्स टाईम्स के सह संपादक के रूप मे जो शुरू हुआ वह आज पांच दशक बाद भी कायम रहा.
पत्रकारिता की इस लंबी यात्रा मे भोपाल के छोटे बड़े अखबारों से लेकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय अखबारों जैसे न्यूयार्क टाईम्स, द इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया, संडे, द संडे आबज़र्वर, इंडिया टुडे, आउट्लुक, इकॉनमिक एण्ड पोलिटीकल वीकली, इंडियन एक्सप्रेस, जनसत्ता, नवभारत टाईम्स, दिनमान, न्यूज टाइम, ट्रिब्यून् , द वीक, द एशियन एज और द इंडिपेंडन्ट जेसे प्रतिष्ठित प्रकाशनों से विभिन्न रूप से जुड़े रहे.
राजकुमार 1998 से 2003 तक एनडीटीवी के मध्य प्रदेश ओर छत्तीसगढ़ के ब्यूरो प्रमुख रहे. 2003 में दैनिक भास्कर इंदौर संस्करण के सम्पादक और फिर भोपाल में 2009 तक भास्कर समूह में ही संपादक (मैगज़ींस) रहे.
राजकुमार मुल्क का इकलोता ऐसा पत्रकार था जिसने 1984 मे विश्व की भीषणतम भोपाल गैस त्रासदी की चेतावनी 1981 से ही देना शुरू कर दी थी. आप लगातार लिखते रहे, चेताते रहे “बचाइये हुज़ूर, इस शहर को बचाइये”, “ज्वालामुखी के मुहाने बैठा भोपाल” और “न समझोगे तो आख़िर मिट ही जाओगे.” आपको इस रिपोर्टिंग के लिए पुरुस्कार स्वरूप राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय इस्तर पर सराहा गया.
श्री राजकुमार केसवानी को एक पड़ा-लिखा पत्रकार कहने की वजह मेरी यही थी. इन्हे मालूम था गैस कौनसी है उसकी प्रोपार्टिस क्या है और उस से क्या बनाया जाता है.
केसवानी जी की कलम खबरों तक ही सीमित नहीं थी. वे प्रसिद्ध कथाकार ज्ञानरंजन के साथ देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘पहल’ के सम्पादक भी रहे. नया ज्ञानोदय , कथादेश, कादंबिनी सहित देश भर की साहित्यिक पत्रिकाओ मे कविता, कहानियों का प्रकाशन लगातार होता रहा.
आप की लिखी प्रमुख किताबे है जो चर्चित है.. सन 2006 मे पहला कविता संग्रह “बाक़ी बचें जो”, सन 2007 मे दूसरा संग्रह “सातवाँ दरवाज़ा “ और सन 2008 मे 13वीं शताब्दी के महान सूफ़ी संत-कवि मौलाना जलालउद्दीन रूमी की फ़ारसी कविताओ का हिंदोस्तानी अनुवाद “जहान-ए-रूमी”.
बॉलीवूड हो या हॉलिवूड राजकुमार केसवानी फिल्मों के इंसाइक्लोपीडिया है आप पिछले तेरह वर्षों से दैनिक भास्कर मे संगीत सिनेमा को समर्पित मशहूर कालम “आपस की बात” लिख रहे है.
केसवानी जी को मिले अनेक पुरस्कारों में सन 1985 में श्रेष्ठ पत्रकारिता के लिए भारत का सर्वोच्च पुरुस्कार बी डी गोयनका अवॉर्ड, 2010 मे पर्यावरण पर रिपोर्टिंग के लिए प्रतिष्ठित प्रेम भाटिया जर्नलिज़्म अवॉर्ड शामिल हैं.
2004 मे केनेडियन ब्रॉडकास्टिंग कार्पोरेशन और व्हाइट पाईन पिक्चर्स द्वारा पत्रकारिता में उनके अवदान को रेखांकित करता व्रतचित्र “भोपाल-द सर्च फॉर जस्टिस” .
पेगविन द्वारा प्रकाशित अंग्रेज़ी पुस्तक “ब्रेकिंग द बिग स्टोरी” के प्रथम अध्याय के लेखक थे. सन 2008 मे एशिया के 15 चुनिंदा पत्रकारों में चयन, जिनके लेख छह एशियाई भाषाओ मे पुस्तक रूप मे कोरिया से प्रकाशित .
आप के शौक भी निराला थे, और ज़रा हट के थे. आप के पास शास्त्रीय,फ़िल्मी संगीत सहित दुनिया-जहान के संगीत रिकार्ड का अद्भुत संग्रह है. गिने तो नहीं पर राजकुमार बताते थे लगभग 33 हज़ार रिकार्ड हैं. जिसमे इंडिया का पहला रिकार्ड गौहर जान का गाया 78 rpm, सन 1903 मे रिकार्ड हुआ रिकार्डॅ भी है. केसवानी जी भारतीय सिनेमा का चलता फिरता इंसाक्लोपिडिया थे.
श्री राजकुमार केसवानी जेसी शख्सियत की भोपाल में मौजूदगी ही भोपाल के लिए गौरव की बात थी.
खिराज़े अकीदत राजकुमार केसवानी जी. बेहद याद आओगे.