श्रद्धांजलि: देश की पुलिस के लिए प्रेरणा स्त्रोत रहेंगे संजीव कुमार सिंह

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शशी कुमार केसवानी


राष्ट्रीय अनुसंधान एजेंसी यानी एनआईए के पहले आईजी संजीव कुमार सिंह का ताल्लुक बिहार के समस्तीपुर से था, लेकिन वो मध्य प्रदेश कैडर के 1987 बैच के भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी थे। 16 अक्टूबर 2020 को गुड़गांव के एक अस्पताल में डेंगू से जंग हार जाने वाले सिंह को इसलिए याद रखा जाएगा क्योंकि उन्होंने देश ही नहीं बल्कि दुनिया में आतंक के खिलाफ लड़ने वाली अपनी तरह की पहली संस्था को आकार और पहचान दिलाने में भरपूर और भरसक कोशिशें कीं। जनवरी 2009 में जब सिंह ने एनआईए जॉइन किया था, तब उन्हें पहले प्रोजेक्ट के तौर पर मुंबई के 26/11 हमले के दोषियों को बेनकाब करने का जिÞम्मा सौंपा गया था। दिसंबर 2011 में जो चार्जशीट फाइल की गई, उसमें कहा गया कि मुंबई हमले में पाकिस्तान में आर्मी अफसर रह चुके दो लोगों का सीधा हाथ था। अपनी काबिलियत और नए प्रयोगों से सिंह ने तारीफ पाई तो एनआईए ने पहचान। 61 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कहा दिया। मुंबई हमले की गुत्थी को सुलझाने के लिए सिंह ने पहली इस तकनीक समेत कई एडवांस्ड सॉफ्टवेयरों की मदद ली थी और भारत में इस भीषण आतंकी हमले में पाक के आर्मी अफसरों की भूमिका को साबित किया था। हॉटमेल, माइक्रोसॉफ्ट के साथ ही अमेरिका के न्याय विभाग की मदद लेकर सिंह के कार्यकाल में एनआईए ने इस केस को निर्णायक मोड़ तक पहुंचाया। जांच इतिहास में ऐसा पहले नहीं हुआ था। किसी आतंकी केस में फाइल की गई सबसे बेहतरीन जांच रिपोर्ट्स में सिंह और उनकी टीम द्वारा तैयार और फाइल की गई इस केस की चार्जशीट को शुमार यिका जाता है, जिसमें मिनट डिटेल्स तक थे। साइबर ट्रैकिंग सहित ऐसे कई पैमाने इस केस की जांच ने तय किए, जो आधुनिक जांच तकनीक के आधार माने गए। अपनी प्रोफेशनल हदों को समझते हुए सिंह को ये पता था कि काम कैसे और किस सूत्र से करना होता है। उदाहरण के तौर पर डीएसपी रहते हुए जब उन्हें एक संदिग्ध आतंकी के कॉल डिटेल्स की अर्जेंट जरूरत थी, तब उन्होंने अपने बर्ताव से टेलिकॉम कंपनी के अधिकारियों का दिल जीतकर कुछ ही देर में सब रिकॉर्ड्स निकलवा लिये थे। दूसरी तरफ, मौके पर दिलेरी दिखाने से भी पीछे नहीं हटते थे। ऐसा ही एक किस्सा तब का है, जब 2011 में एक लड़की डूब रही थी और सिंह ने अपनी कार से सीधे पानी में छलांग लगाकर उसे बचाया था। ऐसे अनेकों किस्से भाई संजीव सिंह के है जिन्हें भुलाना नामुमकिन है। संजीव भाई से कोई एक बार मिल लेते थे तो शायद उन्हें कभी कोई भूल नहीं पाता था। पुलिस ट्रेनिंग से लेकर आखिरी दिन तक उनकी दिलदारी और यारबाजी के अनेकों किस्से है जिन्हें याद करके आज भी आखें नम हो जाती है। मेरे को याद आ रहा है। भोपाल में 1996 से 97 के बीच एसपी रहते हुए सिंह ने तत्कालीन मंत्री के बेटे की पिटाई सार्वजनिक रूप से की थी क्योंकि वह एक लड़की के खिलाफ भद्दे कमेंट यानी ईव टीजिÞंग कर रहा था। उस वक्त सिंह को यह पता था कि वो लड़का कौन था, उसके बावजूद उन्होंने उसे सबक सिखाने से परहेज नहीं किया था। इस किस्से की गूंज काफी समय तक भोपाल और मप्र के सियासी व प्रशासनिक गलियारों में रही थी।

अक्टूबर 2013 में जब नरेंद्र मोदी पटना के गांधी मैदान में भाषण दे रहे थे, तब वहां हुए बम धमाके के हाई प्रोफाइल केस की जांच सिंह ने संभाली थी।

जुलाई 2013 में बोधगया बमकांड की गुत्थी भी सिंह ने सुलझाई थी। इसके अलावा, 25 कांग्रेसी नेताओं को मौत के घाट उतारने वाले नक्सली हमले यानी झीरम घाटी नरसंहार कांड की जांच भी सिंह के नेतृत्व में ही हुई।