बात दिल की
– शशी कुमार केसवानी

नमस्कार दोस्तो, आइए आज बार करते है एक ऐसी कमाल की शख्सियत की जिसने फिल्म इंडस्ट्री को एक इर्न ऊंचाईयां दी। अपने अभिनय के साथ साथ अपने मासूमियत चेहरे का खूब फायदा उठाया। मुझे याद है कई फिल्मी लेखकों ने मुझसे बात करते हुए बताया था कि आजकल फिल्म के हीरो के चेहरे को देखकर फिल्में लिखी जाती है। जी हां दोस्तों मैं बात कर रहा हूं आपके पसंदीदा और मेरे दिल के करीब अभिनेता ऋषि कपूर की। जिसने जीवन भर खुल्लम खुल्ला प्यार ही नहीं किया बातें भी खुल्लम खुल्ला की। और अपनी किताब का शीर्षक भी खुल्लम खुल्ला दे दिया। ये हिम्मत और हौसला ऋषि कपूर का ही हो सकता है। जो टल्ली होने के बाद जो बात कहें बाद में उसपर कायम रहे यह किसी के बस की बात नहीं होती अपने अभिनय से तो लोगों को दिवाना बनाया ही पर इंडस्ट्री के कई लोगों की लू भी उतार दी अपनी बातों से। मुझे आत भी याद है 90 के दशक में जब मेरी उनसे मुलाकाम होती थी तो हर बार वहीं जोश बरकरार रहता था। पर हां डायलाग चिपकाने में कसर नहीं छोड़ते थे। एक बार पृथ्वी थियेटर में किसी फैन ने आकर चिंटू कह दिया था। उसके वो हाल किए थे कि मेरे साथ जो लोग थे हंस हंस कर उल्टे हो गए थे। अब मुश्किल ये है हमारे लिए कि ऐसी शख्सियत की एक बार में बात कैसे कर सकते है। मेरे पास तो किस्से कहानियों का खजाना है तो इस बार के साथ-साथ अगली बार भी ऋषि के दिलचस्प किस्सों पर बात दिल से करेंगे। अभी तो कुछ अनसुने किस्सों को जानिए ।
ऋषि कपूर एक जिंदादिल इंसान थे। कब क्या कर दे ये कोई नहीं जानता था। मुझे उनकी कही हुई बातें तेज तर्रार तरीके से दिए गए जवाब आज भी कानों में गूंजते हैं । बेटी से विवाद के बाद छोड़ दी थी स्मोकिंग : ऋषि कपूर ने बुक खुल्लम खुल्ला में लिखा भी है और बताया भी है कि वे एक जमाने में खूब सिगरेट पीया करते थे, लेकिन बेटी रिद्धिमा से विवाद के बाद उन्होंने इसे हमेशा के लिए छोड़ दिया। मैं बहुत ज्यादा स्मोकिंग करता था, लेकिन मैंने तब सिगरेट छोड़ दी, जब बेटी ने मुझसे शर्त रखी कि अगर आप स्मोकिंग नहीं करेंगे तभी आपको सुबह-सुबह किस मिलेगी वर्ना किसी भी तरह से आपको प्यार नहीं किया जाएगा क्योंकि आपके मुंह से बदबू आती है। रिद्धिमा ऋषि की पहली संतान हैं। 1980 में उनका जन्म हुआ था। ऋषि कपूर बेटी के लिए दिवाना था और जरूरत से ज्यादा प्यार भी करता था। तो उन्हें उसके प्यार के आगे स्मोकिंग कमजोर नजर आई इसलिए उन्होंने स्मोकिंग छोड़ दी। एक बार बातचीत में बताया था जब रिद्धिमा का जन्म हुआ तो हमारे भाव सातवें आसमान पर थे। बाद में रणबीर का जन्म हुआ और उनकी फैमिली कम्प्लीट हो गई। इस खुशी में कई बार एक दो पैक ज्यादा ही लगा देता था। वो पल बड़े मजेदार होते थे जब कोटा के बाद एक दो पैक पी लिए जाए।
बच्चों के लिए बहुत ज्याद पजेशिव थे : ऋषि कपूर ने बताया था कि वे उस वक्त बहुत बिजी थे और बच्चे बहुत छोटे थे, लेकिन वे उनके साथ समय बिताने की पूरी कोशिश करते थे। सन्डे को उनका ऑफ रहता था और हर साल एक महीने के लिए बच्चों को अब्रॉड भी ले जाते थे। इसके अलावा, आउटडोर शूट पर भी बच्चे उनके साथ होते थे। ऋषि की मानें तो वे उन्हें पूरा अटेंशन देते थे। फिर चाहे वर्क शेड्यूल कितना भी हैक्टिक क्यों न हो। उन्होंने लिखा है कि जब वे आउटडोर शूट पर जाते थे तो उनके साथ सारे नौकर-चाकर भी होते थे। फिर चाहे वह कुक हो या मेड। बकौल ऋषि, हमारे साथ वीडियो कैमरा, वीडियो प्लेयर और एक टीवी सेट भी होता था, ताकि बेटी खाना खाते समय कार्टून देख सके। शुरुआती दिनों में जब मैं कश्मीर, मैसूर या फिर यूएस में शूट करता था तो रिद्धिमा के लिए स्पेशल कुक रखा हुआ था। ताकि वह उसे उसकी पसंद का खाना बनाकर दे सके। हमारे डोमेस्टिक स्टाफ में से बहादुर और अम्मा हर जगह साथ होते थे। मेरा पूरा क्रू साथ होता था, ताकि पत्नी और बेटी कम्फर्टेबल और सुरक्षित महसूस कर सकें।
ऋषि ने बताया था, टीना मुनीम ने स्क्रीन पर अलग आकर्षण बनाया था। मैंने उनके जैसी किसी और मॉर्डन-खूबसूरत को-स्टार के साथ कभी काम नहीं किया। लोग कहते थे कि हम स्क्रीन पर अच्छे लगते हैं। कर्ज में हमने साथ काम किया, जो मेरे दिल के बेहद करीब है। हमारी दोस्ती और साथ आ रही फिल्मों के कारण हमारे सीक्रेट अफेयर की अफवाह उड़ी। लोगों ने कहानियां बनाना शुरू कर दी थीं। तब मैं शादीशुदा नहीं था और टीना का अफेयर संजय दत्त के साथ था। जब संजू ने हमारे अफेयर की खबर सुनी तो एक दिन वे ड्रग्स के नशे में गुलशन (ग्रोवर) के साथ नीतू कपूर के पाली स्थित अपार्टमेंट में झगडऩे पहुंच गए। गुलशन ने मुझे बाद में बताया कि फिल्म रॉकी की शूटिंग के दौरान संजय, नीतू के घर झगडऩे पहुंच गए थे, लेकिन नीतू ने इस सिचुएशन को बेहतरीन तरीके से संभाला। उन्होंने शांतिपूर्वक संजू को समझाया कि वे बातें महज अफवाहें हैं। नीतू ने उनसे कहा था-टीना और चिंटू के बीच ऐसा कुछ नहीं है। वे सिर्फ अच्छे दोस्त हैं। इंडस्ट्री में रहते हुए तुम्हें अपनों पर भरोसा करना सीखना चाहिए। कुछ वक्त बाद, मैं और संजू इन बातों को याद करके हंसते थे। हम दोनों ने इन बातों को कई बार साथ पीते हुए खुब मजेदार किस्से कहानियां एक दूसरे को बताए। पर फिल्म इंडस्ट्री में कोई किसी के ऊपर बहुत जल्दी भरोसा भी नहीं करता शक की सुई एक दूसरे पर अटकी ही रहती है। पर ये अफवाहें तब साफ हुईं जब नीतू और मेरी शादी हुई और इस शादी में मेरी सारी हीरोइन्स के साथ साथ इंडस्ट्री के सभी कलाकार पहुंचे। मेरे साथ जिनका भी नाम जुड़ा वे सभी हीरोइने मेरी शादी में बहुत खुश थी। ऐसा मुझे भी महसूस कराया और कई कलाकारों को भी इसी तरह से अहसास कराया। सबने अपने अभिनय की पूरी क्षमता दिखाई। ये बात बताते हुए उन्होंने जोर से ठहाका लगाते हुए कहा कि आप पुराने जख्मों को खुब कुरेदते हो।
अमिताभ बच्चन के साथ रहा अनकहा तनाव – अमिताभ बच्चन एक महान एक्टर हैं। 1970 की शुरुआत में उन्होंने फिल्मों का ट्रेन्ड ही बदल दिया। एक्शन की शुरुआत ही उन्हीं से होती है। उस वक्त उन्होंने कई एक्टर्स को बेकार कर दिया। मेरी फिल्मों में एंट्री 21 साल की उम्र में हुई। उस वक्त फिल्मों में कॉलेज जाने वाला एक लडक़ा हीरो हुआ करता था। मेरी कामयाबी का सीक्रेट बस यही है कि मैं काम को लेकर काफी जूनूनी रहा। मेरे ख्याल से पैशन ही आपको सफलता दिलाता है। उन दिनों अमिताभ और मेरे बीच एक अनकहा तनाव रहा करता था। हमने कभी उसे सुलझाने की कोशिश नहीं की और वह खत्म भी हो गया। इसके बाद हमने साथ में अमर अकबर एंथनी की और फिल्म के बाद तो गहरी दोस्ती हो गई। लेकिन अंदरूनी तौर पर दोस्ती में भी तल्खी बनी रही। हालांकि ये तल्खी बाद एक प्यार के रिश्ते में बदल भी गई। मैं उनके साथ अनकम्फर्टेबल महसूस करता था। वे मुझसे 10 साल बड़े थे, लेकिन मैं उन्हें अमितजी की जगह अमिताभ ही बुलाता था। शायद मैं बहुत बड़ा बेवकूफ था। कभी-कभी की शूटिंग के वक्त तो न मैं उनसे बात करता था और न ही वे। हालांकि, बाद में सब ठीक हो गया और हमारे रिश्ते बेहद अच्छे हो गए। अब तो उनसे फैमिली रिलेशनशिप है। उनकी बेटी श्वेता की शादी मेरी बहन रितु नंदा के बेटे निखिल से हुई है।
30 हजार में खरीदा था बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड – ऋषि ने एक बातचीत में बताया भी है और खुल्लम खुल्ला में लिखा है, ऐसा लगता है कि बॉबी के लिए मुझे बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड मिलने से अमिताभ निराश हो गए थे। उन्हें लगा था कि ये अवॉर्ड जंजीर के लिए जरूर मिलेगा। दोनों ही फिल्में एक ही साल (1973) में रिलीज हुई थीं। मुझे ये कहते हुए शर्म आती है कि मैंने वह अवॉर्ड खरीदा था। दरअसल उस वक्त में भोला-भाला सा था। तारकनाथ गांधी नामक एक पीआरओ ने मुझसे कहा, सर 30 हजार दे दो, तो मैं आपको अवॉर्ड दिलवा दूंगा। मैंने बिना कुछ सोचे उन्हें पैसे दे दिए। मेरे सेक्रेटरी घनश्याम ने भी कहा था, सर, पैसे दे देते हैं। मिल जाएगा अवॉर्ड। इसमें क्या है। अमिताभ को बाद में किसी से पता चला कि मैंने अवॉर्ड के लिए पैसे दिए थे। मैं बस इतना कहना चाहता हूं कि 1974 में मैं महज 22 साल का था। पैसा कहां खर्च करना है, कहां नहीं, इसकी बहुत समझ नहीं थी। बाद में मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ। कभी-कभी के दौरान रिलेशन में गर्मजोशी न होने की एक और कहानी है। अमिताभ फिल्म में सीरियस रोल में थे। जबकि मेरा रोल थोड़ा उलट था। फिल्म में मैं मस्ताने किस्म का हूं। अमिताभ रोल में गंभीरता बनाए रखने के लिए सेट पर अलग-थलग रहते थे। शायद सच तो ये है कि मैंने अवॉर्ड खरीदा था, सबने ये जान लिया था।

ऋषि कपूर अनसेंसर्ड की लॉन्चिंग के दौरान ऋषि कपूर ने बताया था कि रणबीर लाइफ में उनकी तरह पिता नहीं बनना चाहते। इसकी वजह बताते हुए ऋषि ने कहा- दरअसल, रणबीर जब छोटा था तो मैं अपने काम और फिल्मों में बिजी रहता था। यही वजह है कि वह बचपन से ही अपनी मां से ज्यादा क्लोज है। शायद उसे हमेशा ही अपने पिता की कमी महसूस हुई है, लेकिन मैं माफी चाहता हूं कि मैं ऐसा नहीं कर सका। रणबीर को लगता है कि जब उसके बच्चे होंगे तो वह उनके साथ वैसा बिहैव नहीं करेगा जैसा मैंने उसके साथ किया। ये एक जेनरेशन गैप है। मैं बेटे का दोस्त बनकर नहीं रह सकता। दरअसल मैंने जिंदगी को लेकर अपने और बेटे के बीच हमेशा एक अंतर रखने की कोशिश की, शायद यही बात उसे पसंद नहीं है। एक बार बातचीत में बताया था कि कुछ चीजों के लिए मैं हमेशा सख्त रहता हूं। खासतौर पर रणवीर को लेकर कई बार जरूरत से ज्यादा नाराज हो जाता हूं। इसी वजह से नीतू से भी बहस हो जाती है। मेरे साथ मुश्किल ये है कि मैं अपने परिवार के लिए हमेशा जरूरत से ज्यादा सोचता हूं। और चाहता हूं जैसा मैं चाहू वैसा ही करें पर ऐसा मुमकिन नहीं। समय के साथ-साथ चीजें बदलती है। पर मुझे खुद को बदलने में बहुत कठिनाई होती है।
राज कपूर को पिता ज्यादा गुरु मानते थे ऋषि- ऋषि कपूर अपने पिता राज कपूर को पिता से ज्यादा गुरु मानते थे। उन्होंने कहा था, लोग कहते हैं कि मैं मुंह में चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुआ। और हां आपने भी तो एक अखबार में मेरे लिए लिखा था सोने का चम्मच मुंह में लेकर और चांदी के चम्मच हाथों में लेकर मेरा जन्म हुआ है। लेकिन इसमें मेरा क्या दोष। हां मैं मानता हूं, मुझसे कुछ गलतियां भी हुई है। जिसकी सजा भी मुझे मिली है। मुझे बॉबी फिल्म से काफी शोहरत और सक्सेस मिली, लेकिन मैंने भी अलग-अलग तरह से स्ट्रगल को फेस किया है। मेरे लिए राज कपूर सिर्फ मेरे पिता नहीं, बल्कि गुरु थे। मैं आज जो कुछ भी हूं उन्हीं की बदौलत हूं। शूटिंग के दौरान उन्होंने बहुत सख्ती बरती थी। तब मुझे गुस्सा बहुत आता था पर बाद में अहसास हुआ कि वो सख्ती से ही मैंने काम ठीक किया। पर आपको तो लगता है पिता मुझे झुले में झुलाझुला कर काम कराते थे। अगर आप वहां उस समय होते तो आपको अहसास होता राजकपूर राजकपूर ही थे। वो किसी के साथ किसी तरह का पक्षपात नहीं करते थे।
1988 में दाऊद इब्राहिम से की थी मुलाकात- ऋषि ने अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम से उनकी मुलाकात के बारे में कई रोचक बातें बताई। फेम ने मुझे कई अच्छे लोगों से कॉन्टेक्ट कराया, तो वहीं कुछ संदिग्ध लोगों से भी मिलवाया। उन लोगों में एक दाऊद इब्राहिम भी था। बात साल 1988 की है। मैं अपने क्लोज फ्रेंड बिट्टू आनंद के साथ दुबई गया था जहां मुझे आशा भोसले और आरडी बर्मन का नाइट प्रोग्राम अटेंड करना था। दाऊद का एक आदमी एयरपोर्ट पर रहता था जो उसे वीआईपी लोगों की खबरें देता था। तभी एक अजनबी शख्स ने मेरे पास आकर मुझे फोन दिया और कहा- दाऊद साहब बात करेंगे। ये सब बात 1993 के मुंबई ब्लास्ट से पहले की थी। मुझे नहीं लगता था कि दाऊद भागा हुआ था और न ही वह उस स्टेट का दुश्मन था। दाऊद ने मेरा स्वागत किया और कहा – किसी भी चीज की जरूरत हो तो बस मुझे बता देना। उसने मुझे अपने घर भी बुलाया। मैं भौंचक्का था।
दाऊद ने ऋषि को चाय पर बुलाया था – ऋषि ने आगे बातया कुछ समय बाद मुझे एक लडक़े से मिलवाया गया जो ब्रिटिश जैसा दिखता था। वह बाबा था, दाऊद का राइट हैंड। उसने मुझसे कहा- दाऊद साहब आपके साथ चाय पीना चाहते हैं। मुझे इसमें कुछ गलत नहीं लगा और मैंने न्यौता स्वीकार कर लिया। उस शाम मुझे और बिट्टू को हमारे होटल से एक चमकती हुई रोल्स रॉयस में ले जाया गया। वहां बात कच्छी भाषा में हो रही थी मुझे समझ नहीं आ रहा था, लेकिन मेरा दोस्त समझता था। हमें सर्कल में ले जाया गया था इसलिए हमें लोकेशन सही से समझ नहीं आई। दाऊद ने मुलाकात के दौरान सूट पहना हुआ था। आते ही उसने कहा कि मैं ड्रिंक नहीं करता इसलिए आपको चाय पर बुलाया। इसके बाद हमारा चाय और बिस्किट का सेशन 4 घंटे चला। दाऊद से मेरी कई सारी बातें हुईं, जिसमें उसकी क्रिमिनल एक्टिविटीज भी शामिल थीं। इन पर उसे कोई पश्चाताप नहीं था। उसने मुंबई कोर्ट मर्डर का जिक्र करते हुए कहा, उस शख्स को मैंने इसलिए शूट किया था, क्योंकि वह अल्लाह शब्द के खिलाफ जा रहा था। और मैं अल्ला का बंदा हूं इसलिए मैंने उसे शूट किया। इस रियल लाइफ मर्डर सीन को बाद में फिल्म अर्जुन (1985) में फिल्माया गया।
दाऊद को पसंद थी ऋषि की फिल्म तवायफ – ऋषि ने बताया दाऊद को मेरी फिल्म तवायफ काफी पसंद आई थी। इसका जिक्र करते हुए उसने कहा था, मुझे तवायफ काफी पसंद आई, क्योंकि उसमें तुम्हारा नाम दाऊद था। दाऊद का कहना था कि फिल्म से मैंने उसके नाम को महान बना दिया है। दाऊद ने कहा कि वह मेरे फादर, मेरे अंकल, दिलीप कुमार, महमूद, मुकरी जैसे एक्टर्स को काफी पसंद करते है और मेरे संबंध भी सभी से बहुत अच्छे है। दाऊद से मिलने जाने से पहले तक मैं काफी डरा हुआ था, लेकिन वहां जाने के बाद मैंने काफी रिलेक्स फील किया। दाऊद से एक बार फिर मेरी मुलाकात 1989 में दुबई में हुई। उस दौरान नीतू भी मेरे साथ थीं। हम शॉपिंग पर गए थे। शॉप में ही दाऊद से मुलाकात हुई थी। दाऊद हमेशा मुझसे गर्मजोशी से मिला, लेकिन पता नहीं बाद में ऐसा क्या हो गया कि उसने भारत के खिलाफ ऐसा खौफनाक कदम उठाया।
121 फिल्मों में काम ही नहीं किया अपनी एक अलग छाप भी छोड़ी
ऋषि कपूर ने हर फिल्म में अपना एक अलग अभिनय से लोगों के दिलों में जगह बनाई खास तौर से उस समय युवतियों में ऐसा क्रेज था कि उनकी ऋषि की फिल्मों में लडक़ों के मुकाबले लड़किया ज्यादा नजर आती थी। मुझे याद है किसी भी सिनेमा घर में टिकट की लाइन में एक लडक़े के बाद चार लड़कियां ही नजर आती थी इस तरह की दीवनगी कम ही लोगों के लिए नजर आई थी। तो आइए जानते है ऋषि कपूर ने किस फिल्म में काम किया और किसी सन फिल्म रिलीज हुई। अपने 50 साल के फिल्म करियर में ऋषि ने तकरीबन 121 फिल्मों में काम किया। उन्होंने बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट राज कपूर की फिल्म मेरा नाम जोकर (1970) से डेब्यू किया था। फिल्म में अपने किरदार के लिए उन्हें नेशनल अवॉर्ड मिला था। बतौर एक्टर उनकी फिल्म बॉबी(1973) थी जिसमें वह डिंपल कपाडिय़ा के साथ नजर आए थे। इस फिल्म के लिए उन्हें फिल्मफेयर का बेस्ट एक्टर अवॉर्ड (1974) में मिला था। ऋषि कपूर की छवि एक रोमांटिक हीरो की थी। उन्हें दर्शकों ने रोमांटिक अंदाज में काफी पसंद भी किया। यही वजह है कि 1973 से 2000 के बीच ऋषि ने 92 रोमांटिक फिल्मों में काम किया जिनमें से 36 फिल्में सुपरहिट साबित हुईं। इनमें कर्ज, दीवाना, चांदनी, सागर, अमर अकबर एंथनी, हम किसीसे कम नहीं,प्रेम रोग,हीना जैसी फिल्में शामिल हैं।
नीतू के साथ की 12 फिल्में: ऋषि कपूर की पत्नी नीतू के साथ रोमांटिक जोड़ी काफी पसंद की जाती थी। दोनों ने तकरीबन 12 फिल्मों में साथ काम किया। इनमें खेल खेल में (1975), कभी कभी(1976), अमर अकबर एंथनी (1977), दुनिया मेरी जेब में (1979) और पति पत्नी और वो(1978)(दोनों का गेस्ट अपीयरेंस) हिट साबित हुईं जबकि ज़हरीला इंसान(1974),जिंदा दिल (1975), दूसरा आदमी(1977), अनजाने में (1978), झूठा कहीं का (1979) और धन दौलत (1980), दो दूनी चार(2010), बेशरम (2013) फ्लॉप रहीं।
अग्निपथ में किया नेगेटिव रोल: ऋषि ने निर्देशन में भी हाथ आजमाया। उन्होंने 1998 में अक्षय खन्ना और ऐश्वर्या राय बच्चन अभिनीत फिल्म ‘आ अब लौट चलें’ निर्देशित की। ऋषि ने अपने करियर की शुरुआत से हमेशा ही रोमांटिक किरदार निभाया था, लेकिन फिल्म अग्निपथ में उनके खलनायक के किरदार को देख सभी हैरान रह गए। ऋषि को फिल्म ‘अग्निपथ’ के लिए आईफा का बेस्ट नेगेटिव रोल के अवार्ड से भी नवाजा गया।
नॉट आउट में दिखे बिग बी के साथ : इसके बाद ऋषि सहायक भूमिकाएं करने लगें। ऋषि जलवा (2002), हम तुम (2004), फना (2006), नमस्ते लंदन (2007), लव आज कल (2009) और पटियाला हाउस (2010) जैसी फिल्मों में नजर आए। वह अंग्रेजी फिल्म डोंट स्टॉप ड्रीमिंग (2007) और सांभर सालसा (2008) में भी दिखाई दिए। 2018 में, वह उमेश शुक्ला निर्देशित कॉमेडी-ड्रामा फिल्म 102 नॉट आउट में दिखाई दिए। इसने अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर को 27 साल बाद फिर से एक साथ पर्दे पर नजर आए। ऋषि कपूर की बातें एक बार में समेटी नहीं जा सकती है इसलिए अगले सप्ताह फिर बात करेंगे।


