मन का क्या है
कभी रो लिया,
कभी गा लिया,
कभी हँस लिया,
कभी फँस लिया,
कहीं खो गया,
कुछ मिल गया।
कभी बिन पाए ही हो लिया,
कभी बिन मनाए ही मन लिया,
कभी सोते सोते जाग गया,
तो हँसते हँसते रो लिया।
पल में रूठा तो पल में मान गया।
कहीं गहराई में दुबक गया,
तो फिर कभी ऊबक गया।
कभी तैरा, कभी डूबा।
मन का क्या है
जब रोया,जब खोया,
जब रूठा,जब डूबा
तब राहों में ताका, निगाहों में झाँका।
अकेला ये मन फिर,
तन्हाइयों से डरकर,
कहीं खो गया है,
या के मर गया है।
मन का क्या है,
जो मर भी गया तो

प्रमिला

