जो हम धुएं के गुबारों में बदल जाएंगे

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शरद दुवेदी

यह 1991–92 का एक अजीब सा संक्रमण काल था। तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव देश को उदारीकरण के लिए खोल चुके थे ! राजनीति में खरीदी बिक्री , जाति और अवसरवादिता का बोलबाला बेहद बढ़ चुका था। प्रेस कांफ्रेंस में टेलीविजन न्यूज चैनल के कैमरे और प्रतिनिधि आकर्षण का केंद्र होने लगे थे। हमारी पीढ़ी ने ऐसे ही बेहद चुनौतीपूर्ण माहौल में पत्रकारिता की शुरूआत की। न्यूज एजेंसी यूएनआई से जुड़ने के बाद जब प्रेस कांफ्रेंस में मेरा जाना आरंभ हुआ तो कुछ वरिष्ठ पत्रकारों पर हम प्रशिक्षु पत्रकारों की निगाहें जरूर होती थी। इनमें सर्व श्री विजय तिवारी मजहरउल्लाह , अरूण दीक्षित , राजकुमार केसवानी , एन डी शर्मा और बाद में हरतोष सिंह बल भी शामिल थे। मैं मन ही मन ही इन पत्रकारों की दाद देता था कि चुभते हुए तीखे सवाल किस तरह पूछे जाते हैं यह कोई इनसे सीखे। यूएनआई के मेरे एक साथी इन्हें वेस्ट इंडीज के तेज गेंदबाजों की तर्ज पर भोपाल के पत्रकारों की पेस बैटरी कहते थे। राजनेता चाहे उस समय की सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस का हो या विपक्षी दल भाजपा का , इन पत्रकारों ने किसी को भी नहीं बख्शा। केसवानी जी का अंदाज निराला होता था। भोपाली लहजे के साथ उनके शख्सियत में एक बैचेनी और जुझारूपन हमेंशा नजर आता था। हम युवा पत्रकारों के बीच उनकी पहचान भोपाल गैस हादसे को सबसे पहले उजागर करने वाले तुर्श मिजाज के खोजी पत्रकार के तौर पर होती थी। केसवानी जी ने पत्रकारिता हमेशा अपनी गरिमा को सुरक्षित रखते हुए की और यही वजह रही कि बीते करीब बीस सालों में मैंने उन्हें सत्ता प्रतिष्ठान , राजनीतिक या प्रशासनिक गलियारों में यदा कदा ही देखा। शायद वो यह समझ गए थे कि उनका दौर इस दौर से मैच नहीं करता है। मैं उनके दैनिक भास्कर में छपने वाले कॉलम का बेसब्री से इंतजार करता था। फिल्मी इतिहास से जुड़ी उनकी वाकफियत और संगीत की बारीकियों को वो अपने कॉलम में लिखते नहीं बल्कि जीते थे। यही वजह है कि उनका हर कॉलम अतीत की खूबसूरत फ्रेम में जड़ कर भविष्य के लिए किसी नगीने की तरह सुरक्षित किया जाता रहा। कोविड ने ऐसे कई नामचीन किरदारों को हमसे छीन लिया। कई बार इस बात का भी दुख होता है कि प्रिंट , वेब और टीवी अपनी अपनी खबरों से धूम मचाने का दावा तो खूब करते हैं लेकिन आज भी इन माध्यमों में एक भी राजकुमार केसवानी नहीं है। सादर नमन सर !