वीडी शर्मा का कार्यकाल बढ़ेगा या नहीं? फीडबैक करेगा तय

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TIO BHOPAL

भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति बैठक के बाद मध्यप्रदेश में फिलहाल सत्ता और संगठन में बदलाव की अटकलों पर विराम लग गया है। हालांकि प्रदेश में मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर चर्चा है। इस बीच भाजपा मध्य प्रदेश कार्यसमिति की बैठक 24 जनवरी को भोपाल मुख्यालय में होगी। 

प्रदेश कार्यसमिति की बैठक को राष्ट्रीय कार्यसमिति की फॉलोअप बैठक कहा जा रहा है। इसमें केंद्रीय बैठक में मिले कार्यक्रमों को लेकर चर्चा की जाएगी। सरकार और संगठन के कार्यक्रमों और चुनाव को लेकर रणनीति तय की जाएगी। बैठक में पार्टी की तरफ से जी-20 की प्रदेश में होने वाली बैठकों को लेकर बातचीत हो सकती है। वहीं, पार्टी राजनीतिक प्रस्ताव भी ला सकती है। प्रदेश में 2023 में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर कार्यक्रमों पर बैठक में फोकस होगा।

प्रदेश में एंटी इंकम्बेंसी को लेकर गुजरात चुनाव मॉडल लागू करने को लेकर लंबे समय से चल रहा रही थी। इसमें मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रिमंडल में बदलाव की बात कही जा रही थी। वहीं, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा का कार्यकाल फरवरी 2023 में पूरा हो रहा है। ऐसे में प्रदेश में बड़े परिवर्तन की चर्चा हो रही थी। अब राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक के बाद पार्टी सूत्रों का कहना है कि फिलहाल सत्ता और संगठन में कोई बदलाव नहीं होगा।

भारतीय जनता पार्टी के सूत्रों का कहना कि राष्ट्रीय अध्यक्ष के कार्यकाल बढ़ने के साथ ही आगामी दिनों में उनकी टीम में कुछ बदलाव देखने को मिलेंगे। कुछ राष्ट्रीय पदाधिकारियों के अलावा प्रदेश अध्यक्षों को बदलने जाने की चर्चा है। इसके अलावा 2024 के चुनाव को देखते हुए संगठन में भी कुछ नए लोगों को शामिल किया जाएगा। कुछ प्रदेश अध्यक्षों के कार्यकाल भी बढ़ाए जा सकते है। वी.डी. शर्मा का कार्यकाल बढ़ेगा या नहीं यह सब कुछ फीडबैक पर निर्भर करेगा। राष्ट्रीय स्तर से फीडबैक लेने का काम चल रहा है। इसकी रिपोर्ट कुछ दिनों में दिल्ली पहुंच जाएगी। इसके बाद विधानसभा चुनाव के हिसाब से जिम्मेदारियों में जरूरी बदलाव होंगे। 24 जनवरी को प्रदेश की राजधानी भोपाल में कार्यसमिति की बैठक होगी। इस बैठक में केंद्रीय नेतृत्व से मिले कार्यक्रमों और निर्देशों पर बात चर्चा होगी।

अगर वीडी शर्मा हटे तो इन लोगों की खुल सकती है किस्मत

पार्टी सूत्रों का कहना है कि भाजपा अगर वीडी शर्मा को हटाती है, तो उनके स्थान पर सामान्य वर्ग से ही आने वाले किसी नेता को अध्यक्ष बनाया जा सकता है। इस रेस में पूर्व मंत्री राजेंद्र शुक्ला सबसे आगे नजर आ रहे हैं। शुक्ला की सीएम चौहान के साथ अच्छी ट्यूनिंग बताई जाती है। शुक्ला को प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपकर भाजपा विंध्य और महाकौशल को आसानी से साध लेगी। 2018 के चुनावों में विंध्याचल में ऐसा क्षेत्र था जहां पार्टी ने उम्मीद से अच्छा प्रदर्शन किया था। क्षेत्र की 30 सीटें में से भाजपा को 24 पर विजय मिली थी। जबकि महाकौशल की 38 सीटों में से पिछले 13 सीटों पर जीत हासिल हुई थी।

इस बीच शिवराज सरकार में मंत्री अरविंद सिंह भदौरिया और राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय का नाम भी इस रेस में शामिल है। दोनों ही नेताओं की संगठन में अच्छी पकड़ मानी जाती है। भदौरिया का सीएम चौहान के साथ अच्छा तालमेल है। ग्वालियर चंबल बेल्ट में उनका प्रभाव है। पिछली बार भी उनका नाम प्रदेश अध्यक्ष की रेस में शामिल था। लेकिन एन वक्त पर वीडी शर्मा बाजी मार ले गए। हाल ही में भदौरिया ने करणी सेना का आंदोलन को खत्म करने में अहम भूमिका निभाई है। राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय इन दिनों जिम्मेदारी मुक्त हैं। उनके समर्थक दावा करते है कि वे प्रदेश अध्यक्ष के सबसे प्रबल दावेदार हैं। प्रदेश के हर जिले में उनके समर्थक बताए जाते हैं। जबकि मालावा-निमाड़ में विजयवर्गीय की मजबूत पकड़ मानी जाती है। 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को मालवा निमाड़ की 66 सीटों में 28 सीटें मिली थीं। जबकि कांग्रेस ने यहां 35 सीटों पर जीत हासिल की थी। मालवा-निमाड़ में भाजपा के पिछड़ने के कारण पार्टी को सत्ता से बाहर होना पड़ा था। 2013 के चुनाव में भाजपा ने 57 सीटों पर कब्जा जमाया था, कांग्रेस सिर्फ 9 सीटें जीत सकी थी।  

पार्टी की नजर दलित और आदिवासी वोट बैंक पर

विधानसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा जातीय कार्ड भी खेल सकती है। पार्टी की नजर दलित और आदिवासी वोट बैंक पर है। 2018 के विधानसभा चुनावों में यह तबका पार्टी से छिटक गया था। ऐसे में प्रदेश की कमान किसी दलित या आदिवासी चेहरे को भी सौंपी जा सकती है। आदिवासी चेहरों में राज्यसभा सांसद डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी का नाम सबसे आगे है। सोलंकी बचपन से ही आरएसएस से जुड़े हैं। वे खरगोन-बड़वानी के सांसद रहे माकन सिंह सोलंकी के भतीजे है। मप्र में करीब 22 फीसदी आदिवासी वोटर्स हैं। 84 सीटें आदिवासी बहुल हैं। 2018 के चुनावों में इन 84 सीटों में से 34 पर भाजपा ने कब्जा किया था। जबकि 2013 के चुनावों में पार्टी को 59 सीटों पर जीत मिली थी। ऐसे में भाजपा एक बार फिर आदिवासियों के बीच पैठ बनाने में जुटी हुई नजर आ रही है।

दलित वर्ग को साधने के लिए पार्टी प्रदेश से किसी दलित चेहरे को भी प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठा सकती है। ऐसे में भाजपा के राष्ट्रीय अनुसूचित मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालसिंह आर्य का नाम सबसे आगे है। आर्य, शिवराज सरकार के पिछले कार्यकाल में मंत्री रह चुके हैं। वे 2018 में चुनाव हार गए थे। लाल सिंह ने पार्टी के अनुसूचित जाति मोर्चा के लिए जो काम किए हैं, उसे पार्टी में सराहा जा रहा है। आर्य राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष और अध्यक्ष जेपी नड्डा की गुड बुक में भी शामिल है। मध्यप्रदेश में अनुसूचित जाति वर्ग के लिए प्रदेश की 35 विधानसभा सीटें आरक्षित हैं, जबकि वोट बैंक के लिहाज से 17 फीसदी वोट इसी वर्ग के हैं। यह वोट बैंक 50 से ज्यादा सीटों पर अपनी सीधी पकड़ रखता है और निर्णायक भूमिका में रहता है। वर्तमान में 35 सीटों में से भाजपा के पास 21 सीट है, 14 सीटें कांग्रेस के पास हैं।

विधायकों से वन-टू-वन बात 
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बुधवार को प्रदेश के कुछ विधायकों के साथ भी वन टू वन बैठक की। इसमें उन विधायकों को शामिल किया गया, जो पिछले महीने वन टू वन बैठक में शामिल नहीं हो सके थे। सीएम ने विधायकों को सर्वे के आधार पर उनका परफार्मेंस सुधारने और क्षेत्र में जनता के बीच पकड़ बनाने के सुझाव दिए हैं।