रायपुर। छत्तीसगढ़ में नक्सल समस्या चार दशक पुरानी है। पिछले 15 साल से सत्ता पर काबिज भाजपा सरकार सलवा जुड़ूम अभियान से लेकर आॅपरेशन ग्रीन हंट तक तमाम उपाय करती रही। सैकड़ों नक्सली मारे गए, चार हजार से ज्यादा गिरफ्तारियां हुईं, सैकड़ों ने सरेंडर किया लेकिन मामला सुलझा नहीं।
Chhattisgarh government will challenge the new Naxal policy, worrying about the Naxalite legislators
बस्तर में बीच-बीच में नक्सली बड़ी वारदात कर दुनिया का ध्यान इस समस्या की ओर खींचने में कामयाब होते रहे। भाजपा की सरकार गई तो पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह का भी बयान आया-मुझे दुख है कि नक्सल समस्या को खत्म करने का काम अधूरा रह गया। इधर कांग्रेस की नई सरकार आने के बाद नक्सल समस्या की नीति बदलने की जमकर चर्चा हो रही है।
दरअसल कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में वादा किया था कि शांति के लिए बातचीत का रास्ता खोला जाएगा। आदिवासी इलाकों में कांग्रेस के प्रत्याशी वादा करते रहे कि जेलों में बंद निर्दोष आदिवासियों की रिहाई के लिए पहल की जाएगी। कांग्रेस के स्टार प्रचारक राज बब्बर यहां आए तो नक्सलियों को क्रांतिकारी कह गए। नतीजा भी साफ है। बस्तर की 12 में से 11 सीटें कांग्रेस की झोली में चली गई।
अब नक्सल इलाकों के विधायकों की चिंता है कि इस समस्या को सुलझाने का उनका वादा कैसे पूरा होगा। नई नक्सल नीति को लेकर सरकार भी ऊहापोह में दिख रही है। मुख्यमंत्री ने पहली प्रेस ब्रीफिंग में कहा-हम इसे कानून व्यवस्था की नहीं बल्कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्या मानते हैं। पीड़ितों से बात कर हल निकालेंगे।
इसके बाद उनका बयान आया कि नक्सल इलाकों से फोर्स की वापसी नहीं होगी। इसके बाद नए डीजीपी आए तो उन्होंने कहा-गोली का जवाब गोली से दिया जाएगा। और फिर धुर नक्सल इलाके सुकमा जिले की कोंटा विधानसभा सीट से जीतकर आए राज्य के कैबिनेट मंत्री कवासी लखमा ने बयान दिया कि उनसे बात करेंगे।
यानी जितनी मुंह उतनी बातें। साफ कुछ नहीं है। नक्सल समस्या इतनी जटिल है कि इसका सरल हल हो भी नहीं सकता। बस्तर के नक्सल इलाकों से जीतकर आए एक विधायक कहते हैं कि मेरे लिए तो सबसे बड़ी दिक्कत यही है। नक्सल समस्या नहीं सुलझी तो क्या होगा। यह तो तय है कि लड़कर उनसे नहीं जीत सकते, बात तो करना होगा।
आदिवासियों को रिहा करने के लिए कुछ करें
एक विधायक कहा कि मैंने मुख्यमंत्री से भी कहा है- आदिवासियों की रिहाई के लिए कुछ किया जाए। सीधे रिहाई न हो तो फास्ट ट्रेक कोर्ट से सुनवाई की व्यवस्था तो करा ही सकते हैं। नक्सलियों से बातचीत का माहौल बनाना भी आसान नहीं है।
जानकार बताते हैं कि वे इतनी आसानी से तैयार नहीं होंगे। भरोसाबहाली का संकट है। इसके लिए सरकार को ढेरों पहल करनी होगी। जेलों से रिहाई से लेकर बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, वकीलों पर दर्ज मामलों की वापसी और विस्थापित आदिवासियों को वापस गांवों में बसाने तक का काम करना होगा। नक्सल इलाकों से जो स्कूल, अस्पताल, आंगनबाड़ी बंद किए गए हैं उन्हें दोबारा खोलना होगा। मुठभेड़ बंद करनी होगी, फोर्स में कटौती करनी होगी। इन सब कामों से लंबा समय लग सकता है।

