शिव के साथ नरेन्द्र होते तो नतीजे कुछ और होते…

0
655

बाखबर- राघवेंद्र सिंह

कहते हैं जीत के सब और हार का कोई नहीं होता। मध्यप्रदेश में भाजपा की पराजय के बाद शिवराज सिंह चौहान ने बतौर मुख्यमंत्री हार की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेकर ये संदेश दे दिया है कि अब पार्टी में सामूहिक निर्णय के बजाए जीत में तो सब लेकिन हार के लिए मुख्यमंत्री का गला ही पार्टी के लिए मुफीद रहेगा। ऐसा छत्तीसगढ़ में रमन सिंह ने पार्टी के परास्त होने का ठीकरा अपने माथे लेकर इस परंपरा की शुरुआत कर दी थी जिसे शिवराज ने आगे बढ़ाया है।
If Narendra was with Shiva then the result would be something else …
अब इससे एक बात और निकलकर आती है कि भाजपा में सामूहिक नेतृत्व और जय पराजय का यश अपयश टीम को नहीं बल्कि कप्तान के खाते में जाएगा। 2008 और 2013 को याद करें तो मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव को लेकर शिवराज सिंह और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के तौर पर नरेन्द्र सिंह तोमर की जो जुगलबंदी थी उसने जो सुर निकाले उससे एक बार फिर सत्ता हासिल हुई। इस बार तोमर तो थे मगर बदली हुई भूमिका में।

नंदकुमार सिंह चौहान की जगह जब चुनाव के ऐन पहले भाजपा अध्यक्ष खोज रही थी तब तोमर का नाम शुभंकर के रूप में याद किया था। मगर सत्ता साकेत की साजिश,गुटबाजी,लाभ-हानि का गुणाभाग जोखिम और सुविधा की सियासत के चलते तोमर के बजाए जबलपुर के सांसद राकेश सिंह की अध्यक्ष के तौर पर ताजपोशी हो गई। युध्द के पहले घोड़ा बदलना नुकसान देह होता है ये बात हर कोई जानता है लेकिन भाजपा हाईकमान इस मामूली सी बात को भी समझने में चूक कर गया। चौहान चूक जाए तो समझ में आता है संगठन चूक जाए तो कुछ गले नहीं उतरता। इसका खामियाजा भाजपा को सत्ता से सात कदम दूर रहकर चुकाना पड़ा है।

हमने शुरुआत में कहा था शिव और नरेन्द्र की जुगलबंदी नहीं होने से भाजपा सत्ता से दूर हो गई। इसे यूं समझते हैं जनता से संवाद के लिए तो शिवराज अठारह घंटे काम करने को तैयार । इधर संगठन में बतौर अध्यक्ष 2008 और 2013 में नरेन्द्र सिंह तोमर शादी में जैसे लड़की के पिता की भूमिका थी उसे अदा कर रहे थे। इस मौके पर लाख बुराई होती हो प्रदेश भाजपा के तत्कालीन संगठन महामंत्री अरविन्द मेनन भी याद आते हैं। तोमर की संजीदगी और उनके भरोसेमंद व्यक्तित्व के कारण बागियों को मनाने में काफी मदद मिली।

थोड़ी बहुत कसर रहती थी तो मेनन मान मनौव्वल कर नेता और कार्यकर्ता को पार्टी हित में सक्रिय कर लेते थे। यहां हम राकेश सिंह और संगठन महामंत्री सुहास भगत में कोई मीन मेख नहीं निकालना चाहते लेकिन चुनौतिपूर्ण राजनैतिक हालात में ये दोनों नए प्लेयर साबित हुए और नाराज लोगों को मनाने में कामयाब नहीं हो पाए। संगठन लड़की के पिता और भाई की तरह होता है और चुनाव का मौसम शादी में द्वारे पर आई बारात की तरह।

ऐसे में दूल्हा तो ठीक उसके जीजा,फूफा,चाचा,ताऊ और कुछ आज के जमाने के दूल्हे के मनचले दोस्तों को मनाना मुश्किल भले ही हो नामुमकिन नहीं होता। जीतने वाली पार्टियां अक्सर इस तरह के चौकाने वाले पराक्रम करती रहती हैं। एक बात और कभी कभी बारात में मानदान के रिश्तों को सभांलने के लिए लड़की के भाई और पिता अपनी पगड़ी तक पैरों में रख देते हैं। अगर जबलपुर में राकेश सिंह शरद जैन के खिलाफ खड़े बागी धीरज पटैरिया को मनाने के साथ पथरिया और दमोह में रामकृष्ण कुसमरिया को साध लेते तो भाजपा 109 की बजाए 112 सीट पर होती। इसी तरह उज्जैन में घट्टिया विधानसभा से भाजपा कांग्रेस से लाए गए नेता और आलोट से केन्द्रीय मंत्री के पुत्र की जगह किसी खांटी कार्यकर्ता को टिकट देती तो आंकड़ा 114 तक पहुंच जाता।

ये एक दो उदाहरण हैं इस तरह की सामान्य सी राजनैतिक समझ भाजपा में मंडल स्तर के कार्यकर्ता के पास भी है लेकिन हैरत है कि ये बात भाजपा के प्रदेशस्तर पर बैठे नए नए सूरमा समझ नहीं पाए। अब समीक्षा भी होगी तो इस हार के लिए कमजोर नेताओं के गले ढूंढ़े जाएंगे। छत्तीसगढ़ में रमन सिंह और मप्र में शिवराज की तरह संगठन के लोग भी साहस दिखाकर न तो इस गुनाह को अपने सिर लेंगे और न असफलता के कारण इस्तीफा देंगे। कुछ कार्यकर्ताओं ने बातचीत में सिलवेनिया बल्व के विज्ञापन की तरह हाईकमान को चाहिए कि मध्यप्रदेश भाजपा के सिरे से सारे बल्व बदल डालें। लेकिन ऐसे साहस की उम्मीद कम ही है क्योंकि भांग तो पूरे कुएं में घुली हुई है। राष्ट्रीय अध्यक्ष ही अबकी बार दो सौ पार का हवाई नारा दे जाए तो किससे क्या कहिएगा। वे ऐसा गुजरात चुनाव में भी 150 सीटों का नारा दे चुके थे। हकीकत में वहां बमुश्किल 99 सीटें जीतकर सरकार मे आ पाई। पूरे सीन को यूं भी समझ सकते हैं कि सारा आसमान फटा हुआ है कहां कहां पैबंद लगाएंगे। भाजपा की हार के बाद संगठन लगता है सदमें में हैं और अभी तक पराजय के कारणों पर बातें तो हो रही हैं लेकिन समीक्षा की तारीख तय नहीं हुई है।