भोपाल। मध्यप्रदेश में पिछले कई दिनों से जारी सियासी संग्राम अपने अंजाम तक पहुंच चुका है। मतगणना के बाद तय हो जाएगा कि इस संग्राम में किसकी जीत का झंडा बुलंद हुआ और किसे हार का मुंह देखना पड़ा। आम-तौर पर माना जाता है कि राजनीति के दिग्गज चुनाव नहीं हारते, लेकिन 2013 के चुनावों में जनता ने सीएम शिवराज के सेनापतियों को भी हार का स्वाद चखा दिया था। 2013 में तत्कालीन सरकार के दस मंत्रियों को हार का सामना करना पड़ा था।
In the last phase of political warfare, the breathless breaths of the ministers of Shivraj, the generals defeated the last election
यही वजह है कि फैसले की घड़ी ने सामान्य प्रत्याशियों के साथ ही सियासी सूरमाओं की धड़कनें भी बढ़ा दी होंगी। दरअसल, पिछली बार बीजेपी ने 230 सीटों में से 165 पर विरोधियों को चित किया था। लेकिन, उस लहर में भी शिवराज सरकार के दस मंत्री मैदान में धूल फांकते रह गये थे। चुनावी रण में इन्हें विरोधियों के हाथों मात खानी पड़ी। इस बार के चुनाव में भी बीजेपी के वर्तमान मंत्रियों पर सबकी निगाहें होंगी कि कहीं पिछले पांच साल शान से काटने वाले किसी मंत्री की नैया इस चुनाव में डूब तो नहीं रही।
पिछले चुनाव में शिवराज के इन मंत्रियों को मिली थी हार
अनूप मिश्रा
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के भांजे और उस वक्त शिवराज सरकार में मंत्री रहे अनूप मिश्रा को भितरवार विधानसभा सीट से हार का सामना करना पड़ा था। उन्हें कांग्रेस प्रत्याशी लाखन सिंह यादव ने 6548 वोटों से हराया था। अनूप मिश्रा इस बार भी भितरवार से चुनावी मैदान में हैं।
लक्ष्मीकांत शर्मा
तत्कालीन शिवराज सरकार में कद्दावर मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा को भी पिछले विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था। उन्हें कांग्रेस प्रत्याशी गोवर्धन उपाध्याय ने 1584 वोटों से शिकस्त दी थी। लगातार चार बार विधानसभा का चुनाव जीत चुके लक्ष्मीकांत शर्मा का विजय रथ यहां रुक गया। बाद में व्यापम मामले में फंसने के बाद उन्हें जेल भी जाना पड़ा। फिलहाल सिरोंज सीट से लक्ष्मीकांत शर्मा की जगह उनके भाई उमाकांत शर्मा मैदान में हैं।
रामकृष्ण कुसमरिया
बुंदेलखंड की राजनीति में बाबाजी के नाम से पहचाने जाने वाले रामकृष्ण कुसमरिया को भी पिछले चुनाव में मंत्री रहते हुए राजनगर सीट से हार का सामना करना पड़ा था। उन्हें कांग्रेस प्रत्याशी विक्रम सिंह ने 8607 मतों से हराया था। चार बार विधायक और दो बार सांसद रहे कुसमरिया इस बार दमोह और पथरिया सीट से निर्दलीय चुनावी मैदान में हैं।
करण सिंह वर्मा
सीहोर जिले की इछावर विधानसभा सीट पर तत्कालीन मंत्री करण सिंह वर्मा को भी पिछले चुनाव में मुंह की खानी पड़ी थी। उन्हें कांग्रेस प्रत्याशी शैलेंद्र पटेल ने 744 वोटों से मात दी थी। इस तरह 6 बार विधानसभा चुनाव जीत चुके वर्मा की 7वीं पारी पर पिछली बार रोक लग गयी थी।
जगन्नाथ सिंह
विंध्य अंचल में बीजेपी का बड़ा चेहरा और मंत्री रहे जगन्नाथ सिंह को भी पिछले चुनाव में चितरंगी विधानसभा सीट पर हार का सामना करना पड़ा था। उन्हें कांग्रेस प्रत्याशी सरस्वती सिंह ने 9845 वोटों के अंतर से हराया था। विधानसभा, लोकसभा और राज्यसभा का सफर तय कर चुके जगन्नाथ सिंह 2013 में अपनी कश्ती किनारे नहीं लगा पाये।
अजय विश्नोई
तत्कालीन शिवराज सरकार में मंत्री रहे अजय विश्नोई भी जबलपुर जिले की पाटन विधानसभा सीट पर मुंह के बल गिरे थे, उन्हें कांग्रेस के युवा प्रत्याशी नीलेश अवस्थी ने 12736 वोटों के बड़े अंतर से हराया था।
बृजेंद्र प्रताप सिंह
पिछली बार शिवराज सरकार में राज्य मंत्री रहे बृजेंद्र प्रताप सिंह को भी पवई विधानसभा सीट से हार मिली थी। उन्हें कांग्रेस के दिग्गज नेता मुकेश नायक ने 11,695 वोटों से करारी शिकस्त दी थी।
हरिशंकर खटीक
पिछले चुनाव में टीकमगढ़ जिले की जतारा विधानसभा सीट पर मंत्री रहे हरिशंकर खटीक और कांग्रेस प्रत्याशी दिनेश अहिरवार में कांटे की टक्कर हुई थी। यहां खटीक को महज 233 वोटों के अंतर से हार का सामना करना पड़ा था।
कन्हैयालाल अग्रवाल
तत्कालीन शिवराज सरकार में मंत्री कन्हैयालाल अग्रवाल को भी पिछले चुनाव में हार मिली थी। उन्हें गुना जिले की बमोरी विधानसभा सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी महेंद्र सिंह सिसोदिया से 18561 वोटों के अंतर से हराया था। उस वक्त इस जिले में हार की खूब चर्चा हुई थी।
दशरथ लोधी
पिछली सरकार में राज्य मंत्री रहे दशरथ सिंह लोधी को भी पिछले चुनाव में जबेरा विधानसभा सीट से हार मिली थी। उन्हें कांग्रेस प्रत्याशी प्रताप सिंह ने 11,896 मतों के अंतर से हराया था।

