देवरस और वाजपेयी के मार्ग पर संघ

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TIO राजेश बादल


मोहन भागवत की ताज़ा टिप्पणी अटल बिहारी वाजपेयी के सोच संसार का ही विस्तार है। बयालीस बरस पहले वाजपेयी ने अँगरेजी के एक राष्ट्रीय समाचारपत्र में लेख लिखा था। संभवतया 5 सितंबर 1979 को प्रकाशित इस लेख में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को सलाह दी थी कि उसे हिंदुत्व छोड़ कर भारतीयता की अवधारणा पर काम करना चाहिए।भारतीयता एक ऐसा छाता है ,जिसके तले यहाँ के प्रत्येक नागरिक का भविष्य सुरक्षित है। उसके बाद मैंने उनसे एक साक्षात्कार में भारतीयता और संघ के सोच पर तीख़े सवाल दाग़े थे।उनका उत्तर भी उतना ही धारदार , सीधा और राष्ट्रीय हित को प्रतिबिंबित करता था।उन्होंने साफ़ साफ़ कहा था कि भारतीय लोकतंत्र में नागरिकों को किसी धर्म, समाज, जाति या समूह में बाँट कर नहीं देखा जा सकता।यहाँ सबके हित के प्रयास ही भारत के विकास की कुंजी है।संयोग से इसके चंद रोज़ बाद मुझे मध्यप्रदेश के छतरपुर में संघ के मुखिया बाला साहेब देवरस से बात करने का अवसर मिला।बालासाहेब देवरस तब तक वाजपेयी जी का वह चर्चित आलेख पढ़ चुके थे।उन्होंने मुक्त कंठ से उस आलेख की तारीफ़ की और कहा कि बदलते हिन्दुस्तान में संघ को भी अपने आप को बदलना होगा।यदि वह ऐसा नहीं करता तो राष्ट्र के समग्र सामाजिक, आध्यात्मिक,सांस्कृतिक और सोच की मुख्य धारा से नहीं जुड़ पाएगा।इसलिए संघ अपने भीतर इस मक़सद से सकारात्मक परिवर्तन करेगा।

यहाँ मधुकर दत्तात्रेय देवरस उर्फ़ बाला साहब देवरस के बारे में कुछ जानना दिलचस्प होगा।संस्कृत और दर्शन शास्त्र से स्नातक देवरस ने अँगरेज़ी माध्यम में क़ानून की डिग्री ली थी।उनके कारण ही नागपुर से बाहर संघ कार्यकर्ताओं का जाल बिछाया गया। वे आधुनिक सोच रखते थे और उनके हिंदुत्व का मतलब भारतीय होना था। अटल बिहारी वाजपेयी को संघ से जोड़ने वाले बाला साहब देवरस ही थे और वाजपेयी भी भारतीयता के कट्टर हामी थे। हालाँकि इस मसले पर सरसंघ चालक गुरु गोलवलकर से देवरस के मतभेद थे।दोनों की राय इस बात पर भी मेल नहीं खाती थी कि आज़ाद हिंदुस्तान में संघ को राजनीतिक भूमिका निभानी चाहिए या नहीं। देवरस संघ को राजनीतिक रूप देना चाहते थे। गुरूजी इसके पक्ष में नहीं थे। इसके अलावा देवरस संघ में मुस्लिम समुदाय की सक्रिय भागीदारी के पक्के समर्थक थे। संघ में उस दौर के आला नेता उनके सोच से सहमत नहीं थे।मुस्लिमों की भागीदारी के मसले पर संघ की प्रतिनिधि सभा में विचार के लिए एक प्रस्ताव भी आया था। विचारक पत्रकार राम बहादुर राय का कहना था कि मोरारजी देसाई ने भी इस संबंध में संघ को सलाह दी थी कि संगठन को हर भारतीय के लिए खोल दिया जाना चाहिए। यह अलग बात थी कि खुद देसाई का संघ से कभी कोई लेना देना नहीं रहा।लेकिन बाला साहब के इस विचार को अन्य नेताओं का समर्थन नहीं मिला और देवरस अलग थलग पड़ गए।इसमें दो राय नहीं कि यदि उस समय देवरस की बात मान ली जाती तो संभवतः यह संगठन भारत का प्रतिनिधि सामाजिक,सांस्कृतिक और राजनीतिक संगठन बन सकता था। आश्चर्य की बात तो यह थी कि गुरू जी के निधन के बाद जब उनके लिखे तीन सीलबंद लिफ़ाफ़े खोले गए ,तो उनमें से एक देवरस को अगला सरसंघ चालक बनाए जाने के बारे में था। गुरूजी ने देवरस के अलावा और किसी को अपना उत्तराधिकारी नहीं समझा।
देवरस की संघ मुखिया के तौर पर पारी आधुनिक भारत के साथ क़दम से क़दम मिलकर चलने वाली पारी थी।उनके इशारे पर ही लोकनायक जय प्रकाश नारायण के आंदोलन में संघ के नौजवान कार्यकर्त्ता कूद पड़े थे।उन दिनों गोविंदाचार्य युवा थे और इस आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे।

दरअसल संघ के भीतर भी सदैव दो धाराएँ रहीं।एक अनुदार और कठोर हिंदुत्व पर आचरण की समर्थक थी और दूसरी उदार,सहिष्णु तथा भारतीयता के समग्र सोच को मानती थी।बाला साहब देवरस,अटल बिहारी वाजपेयी और गोविंदाचार्य दूसरी धारा से जुड़े थे।विडंबना यह रही कि इस दूसरी धारा को संघ की प्रतिनिधि सोच नहीं माना गया,जबकि यह बदलते हिन्दुस्तान की माँग थी।इस तरह संघ के उदारवादी कार्यकर्त्ता अपने अस्तित्व के लिए संगठन में हमेशा संघर्ष करते रहे।एक समय तो गोविंदाचार्य के ख़िलाफ़ बाक़ायदा शिक़ायत की गई कि वे लोकनायक के आंदोलन में सक्रिय हिस्सा ले रहे हैं। यह संघ के दिशानिर्देशों के विरुद्ध है। तब बालासाहब देवरस को आगे आकर स्पष्ट करना पड़ा कि उन्होंने ही गोविंदाचार्य को यह निर्देश दिया था।एक समय तो वह भी आया,जब वे पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के प्रशंसक माने जाने लगे ।

कभी कभी इतिहास के संवेदनशील मोड़ पर एक छोटा सा ग़लत फ़ैसला भी आगे जाकर एक बड़ी भूल साबित होता है।जब अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने लेख में सहिष्णुता और भारतीयता का मुद्दा उठाया ,तो उस समय बाला साहब देवरस भी इसके समर्थक थे।लेकिन यह कभी संघ के एजेंडे में परवान नहीं चढ़ सका।उल्टे बाला साहब देवरस और उनके उदारवादी हाशिए पर जाते रहे।जब देवरस बीमार पड़े और पच्चीस – छब्बीस बरस पहले नागपुर में उनके सम्मान में एक विराट आयोजन किया गया तो मैं उस कार्यक्रम को कवर करने नागपुर गया था।उनकी तबियत बहुत ख़राब थी। व्हील चेयर पर वे आयोजन में पहुँचे थे। धीमे धीमे स्वर में बोल रहे थे। उस समय भी वे बदलाव के पक्षधर थे।कुछ समय बाद वे नहीं रहे पर, दो साल पहले ही वे रज्जू भैया को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर चुके थे।


आज भारतीय जनता पार्टी सरकार चला रही है और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की तूती बोलती है।संघ चाहे तो अपनी विचारधारा पर अडिग रह सकता है और बालासाहब देवरस के विचार से दूरी बनाए रख सकता है। उसकी कोई मजबूरी नहीं है। इसके बावजूद मोहन भागवत जब कहते हैं कि भारत में रहने वाले हर व्यक्ति का डीएनए एक ही है और हर नागरिक भारतीय है तो स्पष्ट है कि वह देवरस दर्शन की राह पर चल पड़ा है। यह तो देश का प्रत्येक ज़िम्मेदार नागरिक जानता है कि संघ ने भले ही देवरस की लाइन औपचारिक तौर पर नहीं ली हो,पर हक़ीक़त यह है कि केंद्र और बीजेपी शासित प्रदेशों में मुख्य धारा की राजनीति में संघ का असर या हस्तक्षेप बढ़ता ही जा रहा है।अब संघ यह नहीं कह सकता कि सक्रिय राजनीति से उसका कोई लेना देना नहीं है।जब बीजेपी और संघ के घनघोर विरोधी रहे अन्य दलों के नेताओं का बीजेपी में पलक पाँवड़े बिछाकर स्वागत किया जा रहा हो तो मान लिया जाना चाहिए कि इन दोनों संगठनों का वैचारिक कायांतरण हो चुका है। तो फिर संघ अपने आप को भ्रम में क्यों रख रहा है। देवरस दर्शन और अटल बिहारी के विचार संसार में तो वह दाख़िल हो ही चुका है। आम कार्यकर्त्ता को दुविधा में क्यों रखा जाना चाहिए ?