एक बड़ी लाइन बना रहे हैं दिग्विजय सिंह…

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राघवेंद्र सिंह

राजनीति में दिग्विजय सिंह भी एक अजब ग़ज़ब किरदार हैं । दशहरे से शुरू हुई उनकी शिव धाम उज्जैन से राम धाम अयोध्या तक 950 किमी की पद यात्रा से वे राजनीति में सनातनी संस्कारों का ऐसा मिश्रण बन रहे हैं कि कांग्रेस में टीम आर जी और सत्तारूढ़ भाजपा को बहुत सुहाएंगे नहीं। दरअसल वे राहुल गांधी की मन से रजामंदी के बिना भाजपा की सनातन पिच पर खेल रहे हैं। जो कांग्रेस सनातनियों को खत्म करने वालों के साथ खड़ी हो उसके लिए यह नीम से भी कड़वा है । भाजपा क्यों चाहेगी की कोई दिग्गज विरोधी जिसमे उन्हें उनकी पिच पर चुनौती दे । शिव से राम धाम तक की यात्रा का फ़ार्मूला हिट रहा तो यूपी विधानसभा में कांग्रेस को लाभ मिल सकता है। कितना मिलेगा यह समय के टीम राहुल का रवैया तय करेगा। यात्रा का तीर तो कमान से छूट चुका है।
खैर , इस सब से अलग दिग्विजय सिंह को हवा के विपरीत दिशा में चलने का चस्का सा है। कांग्रेस में रहकर लगातार सनातन के समर्थन में रहना आसान काम नही हैं। नवरात्रि मनाना, शक्ति पीठों के दर्शन करना, कुंभ में पार्टी नेतृत्व की लाइन के गंगा जी डुबकी लगाना, अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए चंदा देना सामान्य से दिखने वाले ये काम आज की कांग्रेस में कल्पना से परे हैं । इसमें जोखिम भी है । लाख काबिलियत हो नेतृत्व करियर चौपट कर सकता है । यह सब नामुमकिन भले ही न हो मगर मुश्किल जरूर है कम से कम पार्टी के राहुल गांधी रिजीम में। कुछ लोग कह सकते हैं कि चर्चाओं में रहना दिग्विजय सिंह को बखूबी आता है । सियासत में सुर्खियों में रहना,शौहरत बटोरना और कांग्रेस में रह कर सनातन संस्कृति धर्म के साथ सकारात्मक रहना कठिन काम है।
बहरहाल , खाँटी गांधीवाद के रास्ते पर चल रहे दिग्विजय सिंह ने 2018 के पहले मप्र में नर्मदा परिक्रमा की थी। यह भी उनकी निजी यात्रा थी। उस समय पंगत में संगत की उनकी रणनीति इतनी कामयाब रही कि नर्मदा पट्टी और उसके आसपास की करीब सवा सौ विधानसभा सीटों पर उसका व्यापक प्रभाव पड़ा। कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ा और चुनाव में सक्रिय हो कर कांग्रेस गठबंधन की कमलनाथ सरकार बनी। इसके बाद उम्र के मान से अस्सी के आंकडें के निकट पंहुचे सिंह रोज पंद्रह किलो मीटर पद यात्रा कर राम मंदिर में चंदा और दान चोरी के मुद्दे को और भी ज्वलनशील बनाएंगे। अब तक मिल रहे जनता के समर्थन पर भाजपा पैनी नजर रख रही है। इस यात्रा का जो भी असर हो कांग्रेस से छन कर आने वाली खबरें बताती है कि कांग्रेस के प्रवक्ता-मीडिया पैनेलिस्ट से लेकर छोटे बड़े नेतागण दूरी बना कर चलें। सामान्य सी दिखने वाली यह लाइन भविष्य में बड़ी दरार भी बन सकती है । कुछ लोग दिग्विजय सिंह को सूबे में तीसरी ताकत के विकल्प रूप में भी देख रहे हैं। हालांकि यह ख्याली पुलाव भी हो सकता है। लेकिन उनके बारे में लंबे समय से यह कहा जाता है कि आप दिग्विजय सिंह से नफ़रत कर सकते हैं मगर उन्हें नज़रअंदाज़ नही कर सकते…उनके दुश्मन और दोस्त जितने जल्दी यह बात समझ लें उतना ही उनकी राजनीतिक यात्रा के लिए लाभकारी होगा। आपनी बात पर अड़ने और मुद्दों पर डटने वाले नेताओं में शुमार दिग्विजय सिंह। विधानसभा चुनाव हारने के बाद दस साल तक राजनीति सन्यास का ऐलान करने के बाद उस पर अमल करने वाले कितने नेता होंगे। जबकि कांग्रेस की मनमोहन सिंह के नेतृत्व में दस केंद्र में सरकार थी।

चस्का सा है हवा के ख़िलाफ़ चलने का

इस सब से अलग दिग्विजय सिंह को हवा के विपरीत दिशा में चलने का चस्का सा है। कांग्रेस में रहकर लगातार सनातन के समर्थन में रहना आसान काम नही हैं। नवरात्रि मनाना, शक्ति पीठों के दर्शन करना, कुंभ में पार्टी नेतृत्व की लाइन के गंगा जी डुबकी लगाना, अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए चंदा देना सामान्य से दिखने वाले ये काम आज की कांग्रेस में कल्पना से परे हैं । इसमें जोखिम भी है । लाख काबिलियत हो नेतृत्व करियर चौपट कर सकता है । यह सब नामुमकिन भले ही न हो मगर मुश्किल जरूर है कम से कम पार्टी के राहुल गांधी रिजीम में। कुछ लोग कह सकते हैं कि चर्चाओं में रहना दिग्विजय सिंह को बखूबी आता है । सियासत में सुर्खियों में रहना,शौहरत बटोरना और कांग्रेस में रह कर सनातन संस्कृति धर्म के साथ सकारात्मक रहना कठिन काम है।