होशंगाबाद। मध्यप्रदेश में लोकतंत्र का महापर्व आखिरी मुकाम पर पहुंच चुका है। इसी हवन कुंड से नतीजे के रूप में कल नई सरकार और नया सरताज निकलेगा। 230 सीटों वाली मध्यप्रदेश विधानसभा के लिए 2907 प्रत्याशी मैदान में हैं। इस बार बुधनी के अलावा होशंगाबाद सीट पर सबकी नजरें टिकी हैं क्योंकि यहां दोनों प्रतिद्वंदियों की छवि गढ़ने वाली छवि तैयार की जा रही है।
Mahabharata of the last democracy, reached the final stage, with the help of Budhni
होशंगाबाद सीट से मध्यप्रदेश विधानसभा अध्यक्ष सीतासरन शर्मा और बीजेपी के पूर्व पीडब्ल्यूडी मंत्री सरताज सिंह की साख दांव पर लगी है, यहां मुकाबला इन्हीं दोनों के बीच है। सरताज सिंह सूबे की सियासत में कद्दावर नेता माने जाते हैं, जोकि सियासी हवाओं का रुख भांपने में भी माहिर हैं। लिहाजा इस बार हवाओं का रुख बदला देख उन्होंने भी अपना रुख बदल लिया और कांग्रेस के टिकट पर अखाड़े में उतर गये। जिससे बीजेपी की परेशानी बढ़ गयी।
बीजेपी की बेचैनी केवल होशंगाबाद सीट के लिए नहीं, बल्कि पूरे होशंगाबाद जिले के लिए है क्योंकि सरताज सिंह का प्रभाव होशंगाबाद की सभी सीटों के साथ ही आस-पास के इलाकों में भी है। प्रचार के दौरान उमा भारती के अलावा स्मृति ईरानी, राजनाथ सिंह, योगी आदित्यनाथ, सीएम शिवराज सिंह और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह वहां सभाएं कर चुके हैं। बीजेपी के सभी नेता होशंगाबाद के अलग-अलग हिस्सों में सभा कर अपनी-अपनी छवि के हिसाब से सरताज सिंह के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश करते रहे, लेकिन ये छवि बिगड़ी या सुधरी, ये तो 11 दिसंबर को ही पता चलेगा।
दरअसल, एक ही जिले में लगातार इतने स्टार प्रचारकों का आना बताता है कि सरताज सिंह का जाना बीजेपी के लिए परेशानी का सबब बन चुका है। होशंगाबाद में बीजेपी की इस बेचैनी की एक वजह कांग्रेस की रणनीति भी है। कांग्रेस ने सिवनी-मालवा जो सरताज सिंह की पारंपरिक सीट है, वहां से कांग्रेस ने उनके पार्टी में शामिल होने से पहले ही ओम प्रकाश रघुवंशी को प्रत्याशी बना दिया था, जबकि सरताज के कांग्रेस में शामिल होने के बाद उन्हें होशंगाबाद सीट से मैदान में उतार दिया, जिसे विधानसभा अध्यक्ष सीतासरन शर्मा की पारंपरिक सीट माना जाता है।
इस क्षेत्र में भी उनकी जमीनी पकड़ है, वह पांच बार विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं। पिछले विधानसभा चुनाव के परिणाम पर गौर किया जाए तो कांग्रेस की ये रणनीति और खास हो जाती है क्योंकि होशंगाबाद जिले में उसने एक भी सीट नहीं जीती थी, लेकिन अब वो इन दो सीटों पर तो मुकाबले में आ ही गई है, साथ ही दूसरी दो सीटों यानी पिपरिया और सोहागपुर पर भी सरताज फैक्टर का असर दिखाई पड़ सकता है।
सरताज सिंह का सियासी सफर
1947 में विभाजन के बाद पाकिस्तान से आकर मध्यप्रदेश के इटारसी में बसने वाले सरताज सिंह का सियासी सफर 1960 से ही शुरू हो गया था। जन संघ से जुड़े सरताज दस साल तक इटारसी नगर पालिका के कार्यवाहक अध्यक्ष रहे। 1989 से 1999 तक वे लगातार चार बार होशंगाबाद सीट से सांसद चुने गये। इस दौरान अटल बिहारी वाजपेयी की 13 दिन की सरकार में उन्हें केंद्रीय मंत्री भी बनाया गया था। 2004 के लोकसभा चुनाव में वे फिर सांसद बने। 2008 में उन्होंने कांग्रेस के कद्दावर नेता और विधानसभा उपाध्यक्ष हजारी लाल रघुवंशी को हराकर मध्यप्रदेश विधानसभा में जोरदार एंट्री मारी ती। यहां भी उन्हें शिवराज सरकार में मंत्री बनाया गया।
अर्जुन सिंह को भी हराया था चुनाव
राजनीति में सरताज सिंह की जमीनी पकड़ मानी जाती है क्योंकि सियासी दंगल में उन्होंने अच्छे-अच्छे सूरमाओं को चित किया है। वे उस वक्त भी चुनाव जीते हैं, जब मध्यप्रदेश में बीजेपी कमजोर मानी जाती थी। लगातार चुनाव जीतने वाले सरताज सिंह को रोकने के लिये कांग्रेस ने 1998 में उनके सामने अपने सबसे बड़े नेता और कांग्रेस के चाणक्य कहे जाने वाले अर्जुन सिंह को मैदान में उतारा था। तब सबको लगा था कि शायद सरताज सिंह चुनाव हार जायेंगे, लेकिन तमाम राजनीतिक समीकरणों को फेल करते हुये सरताज सिंह अर्जुन सिंह को पटखनी देकर मध्यप्रदेश के सियासी हीरो बन गये। अर्जुन सिंह के अलावा उन्होंने कांग्रेस के बड़े नेता रामेश्वर नीखरा और हजारीलाल रघुवंशी को भी चुनाव हरा चुके हैं।

