कांग्रेस कंफर्ट जोन में…, भाजपा सरकार- बढ़ती बेचैनी, खिसकती जमीन

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राघवेंद्र सिंह

भोपाल। इन दिनों दिल्ली से लेकर मध्य प्रदेश तक सियासत में भांग घुली हुई है। कांग्रेस सहित विपक्ष जनाधार बढ़ाने की कोशिश में अटपटे और आत्मघाती कदम उठा रहा है तो दूसरी तरफ भाजपा और उसकी सरकारें अपने नीचे से खिंच रही चादर की तरफ देख ही नहीं पा रही हैं। प्रदेश की डॉ मोहन यादव की सरकार व भाजपा के भीतर असंतोष का माहौल ,मंत्री-विधायकों से लेकर निचले स्तर तक बेचैनी पैदा कर रहा है। मुख्यमंत्री यादव राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर सख्ती और समन्वय की लगातार कोशिशें कर रहे हैं ,सबको प्रयासों के सकारात्मक नतीजों की उम्मीद है। फिलहाल जो माहौल है उस हिसाब से भाजपा में जमीनी नेता और कार्यकर्ताओं में उत्साह का वातावरण कम, उदासी का ज्यादा है। विपक्ष की बात करें तो खासतौर से बहुमत के खिलाफ फैसले करने वाली कांग्रेस सच्चाई से मुंह फेर कंफर्ट जोन में है। मसलन वंदे मातरम का पूरा गान न करना, सिक्खों के खिलाफ दंगों के दोषी सज्जन कुमार की मृत्यु पर उन्हें हीरो बताना ,इस्लाम और क्रिश्चिनिटी को छोड़ सिर्फ सनातन और उससे जुड़े ग्रंथों में बुराइयां ढूंढने की प्रवृत्ति ने कांग्रेस को बहुसंख्यकों से दूरी बनाने का काम किया है। हर किसी को पता है बहुमत के खिलाफ जाने पर कुछ हद तक माइनरिटी के वोट तो मिल सकते है लेकिन जीत नहीं मिल सकती। पिछले दस सालों से फील गुड में डूबी कांग्रेस अपने कंफर्ट जोन से बाहर नहीं आ
पा रही है। कांग्रेस में भी भाजपा की तरह जमीनी नेताओं और कार्यकर्ताओं में नेतृत्व को लेकर उत्साह कम हताशा ज्यादा दिखाई देती है। हाल ही के दिनों में अमेरिका में पैदा हुई कॉकरोच जनता पार्टी के अनजान से नेता अभिजीत दिपके के आह्वान पर जो भीड़ आई सच्ची बात यह है कि उतनी नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के कहने पर पीएम आवास के सामने प्रदर्शन करने के लिए नहीं आई थी ।यह अलग बात हैं कि कांग्रेस में राहुल गांधी समर्थक इस बात से सहमत ना हों।
जहाँ तक मध्य प्रदेश सरकार और भाजपा संगठन का सवाल है ।इन दोनों को लेकर किसानों और आम जनता में प्रतिक्रिया सकारात्मक कम है। लंबे समय से किसान भाजपा के कोर वोट बैंक के रूप में जाना जाता है। लेकिन पिछले दिनों खाद वितरण से लेकर गेहूं और मूंग खरीदी को लेकर जो भारी दिक्कते आई है उससे ये धारणा गांवों में मजबूत हो रही है कि सरकार तो ठीक है मगर उसके अधिकारी कदम कदम पर किसानों के रास्ते में काँटे बिखेर रहे हैं। मामला गंभीर है और सरकार को इसे संजीदगी से लेने की जरूरत है। वजह यह है कि खाद वितरण और गेहूं ,मूंग खरीदी की प्रक्रिया इतनी कठिन बना दी गई है कि किसानों के लिए इसकी पूर्ति में घंटों तो क्या हफ्तों लगाने पड़ते है। उदाहरण के लिए पहले गेहूं खरीदी के लिए स्लॉट बुक करो। दिक्कत बुकिंग में नहीं है ,गांव में बार बार ओटीपी और नेटवर्क की प्रॉब्लम किसानों की दिक्कतों को करेला और नीम चढ़ा जैसा दुष्कर कर दिया है। उसकी दिक्कतों को समाधान सहकारी समितियों के बाबूओं के हाथों में कर दिया है, उन्हें मुश्किल से निकालने के लिए विधायक मंत्री तो छोड़िए चुनाव में वोट मांगने वाले जिले से लेकर मंडल तक के नेता नजर नहीं आते। ऐसी मुश्किलों के मैदान में किसान अपने आपको अकेला पाता है। इसी के चलते लाइन में लगे किसानों के बीच भाजपा को दिन रात कोसने का सिलसिला खूब चल रहा है। कंफर्ट जोन में रहने वाली कांग्रेस ने मूंग खरीदी का एक आंदोलन तो किया लेकिन खाद वितरण में बार बार के ओटीपी वाले सिस्टम से निजात दिलाने के मामले में वह मैदान से गायब है और थकेली साबित हो रही है। अगर वह लगातार किसान के साथ मोर्चे पर रहे तो चुनाव के वक्त एक बड़ा वोट प्रतिशत उसके खाते में जा सकता है, जो भाजपा को चिंता में डालने के लिए पर्याप्त है। वैसे भी कांग्रेस मैदान में लंबी लड़ाई कम लड़ती है,मसलन क्रिकेट की भाषा में कहे तो 5 दिन टेस्ट मैच कम टी-20 ज्यादा खेलती हैं। जबकि भाजपा जैसी अनुशासित पार्टी में भी असंतोष का आलम यह है कि पूर्व मंत्री और वरिष्ठ विधायक अजय बिश्नोई सरकार के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस तक करने के लिए मजबूर हो गये। वैसे विश्नोई ने जो बात कही वह सड़क से जुड़ी जरूर है लेकिन भाजपा सरकार के मंत्री विधायकों के असंतोष का एक तरह से का इकबालिया बयान है ।उनके प्रेस कॉन्फ्रेंस की एक बानगी संक्षेप में यहाँ प्रस्तुत भी कर रहे है जो सुधार करने वाले कर्ताधर्ताओं के लिए काबिले गौर होगी।
बाॅक्स
अजय विश्नोई उवाच…
विधायक की लाचारी या व्यवस्था की लाचारी?
पूर्व मंत्री और भाजपा विधायक अजय विश्नोई ने हालिया प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रशासनिक तंत्र और निर्माण गुणवत्ता की पोल खोल दी है। उन्होंने कहा:
“ठेकेदार कम दर पर काम लेते हैं। रिश्वत कम होती नहीं और मुनाफा कमाना है, तो असर क्वालिटी पर असर आता है। सड़कों की हालत बहुत खराब है। मझौली ब्लॉक में पौड़ा से बचैया सड़क तीन साल से बन रही है, तीन पेटी कॉन्ट्रैक्टर बदल गए पर काम पूरा नहीं हुआ। मझौली में साढ़े पांच करोड़ का काम छह बार टेंडर होने पर भी तकनीकी कारणों से निरस्त हो जाता है। 5 साल के मेंटेनेंस नियम के खिलाफ ठेकेदार हाईकोर्ट से स्टे ले आए हैं, जिससे न मरम्मत हो रही है न नया टेंडर। जनता सबसे पहले अपने विधायक को पकड़ती है और विधायक लाचार है। यदि हमारे कहने के बाद असर नहीं हो रहा, तो इसका एक ही अर्थ है कि अजय विश्नोई कमजोर है। मंत्री मजबूत हैं, सवाल उनसे पूछे जाने चाहिए।”
विश्नोई का यह दर्द केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि पूरी शासन प्रणाली पर सवाल खड़ा करता है। जब सत्ता पक्ष का विधायक ही ठेकेदारों की मनमानी, अफसरशाही और न्यायिक स्टे की आड़ में रुकते विकास कार्यों के आगे बेबस महसूस करे, तो आम नागरिक की हालत समझी जा सकती है। सबकी निगाहें अफसरशाही को कसने के तरीके पर मुख्यमंत्री डॉ यादव के एक्शन पर टिकी है।