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भोपाल के गांधी भवन का मोहनिया सभागार उस शाम खचाखच था।वह शब्दों की चमक से जगमगा रहा था।भारत के महान हिंदी संपादक स्वर्गीय राजेंद्र माथुर की 91वीं जयंती पर यह आयोजन हुआ।इसमें भारत के उन सभी प्रतिष्ठित संपादकों और पत्रकारों ने हिस्सा लिया ,जो कभी उनके साथ काम कर चुके थे।ख़ास बात यह थी कि इस अवसर पर राजेंद्र माथुर का वह रूप उभर कर सामने आया,जो महात्मा गांधी से उनको जोड़ता था। राजेंद्र माथुर प्रसंग – 2026 का विषय था : माथुर के महात्मा। भोपाल में राजेंद्र माथुर की याद में 32 साल बाद कोई कार्यक्रम हुआ।गौरतलब है कि
गांधी भवन में आज भी प्रतिदिन सुबह 10:30 बजे सर्वधर्म प्रार्थना,चरखे पर सूत कताई और साप्ताहिक श्रमदान परंपरा जारी है।
राजेंद्र माथुर प्रसंग की शुरुआत में राजेंद्र माथुर के जीवन पर लघु फिल्म और उनके दुर्लभ साक्षात्कार का अंश दिखाया गया।अतिथियों ने महात्मा गांधी और राजेंद्र माथुर के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की।मंच पर जो संपादक थे,वे वास्तव में हिंदी पत्रकारिता की पूरी गैलेक्सी कहे जा सकते हैं । स्वागत उद्बोधन देते हुए गांधी भवन न्यास के वरिष्ठ न्यासी श्री महेश सक्सेना ने कहा कि आज गांधी भवन के मंच पर पत्रकारिता जगत की एक पूरी आकाशगंगा उपस्थित है। इन वरिष्ठ पत्रकारों के माध्यम से गांधीजी और राजेंद्र माथुर की पत्रकारिता के अनुभवों को सुनना हम सबके लिए सौभाग्य की बात है।
यादों का कारवां
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कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे सप्रे संग्रहालय के संस्थापक संयोजक पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर,मुख्य अतिथि दैनिक भास्कर के प्रधान संपादक प्रकाश दुबे,मुख्य वक्ता वेब दुनिया के संस्थापक संपादक डॉ.प्रकाश हिंदुस्तानी,वरिष्ठ बायोपिक निर्माता निर्देशक,लेखक और राज्यसभा टीवी के संस्थापक संपादक गांधी भवन के न्यासी राजेश बादल और विशिष्ट अतिथियों के रूप में हिंदुस्तान टाइम्स और इंडियन एक्सप्रेस के संपादक रहे चंद्रकांत नायडू, नई दुनिया के प्रधान संपादक रहे उमेश त्रिवेदी, दुनिया इन दिनों के प्रधान संपादक डॉ. सुधीर सक्सेना और हिंदुस्तान के पूर्व ब्यूरो प्रमुख ओमप्रकाश मेहता शामिल थे।सभागार में पूर्व सांसद प्रतापभानु शर्मा भी थे। गांधी भवन न्यास के वरिष्ठ न्यासी बाल साहित्य के अदभुत विशेषज्ञ महेश सक्सेना ने स्वागत भाषण दिया। ओमप्रकाश मेहता ने आते ही राजेश बादल को बधाई दी कि उन्होंने आज राजेंद्र माथुर की पूरी शिष्य मंडली एक जगह एकत्रित कर दी है।उन्होंने भावुक होते हुए कहा,” आज जो कुछ भी हूं, उन्हीं की वजह से हूं।” चंद्रकांत नायडू ने विनम्रता से कहा कि माथुर साहब के साथ भले ही काम का मौका नहीं मिला,पर उनके साथ व्यक्तिगत संपर्क में बहुत सीखा।उन्होंने कहा ,” माथुर जी कहते थे कि पत्रकार बन रहे है तो पत्रकारिता करने की असली स्पिरिट होनी चाहिए।
माथुर के महात्मा
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राजेश बादल ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि आज़ादी के बाद राजेंद्र माथुर अकेले ऐसे संपादक थे,जिन्होंने सभी हिंदी संपादकों की तुलना में सबसे अधिक महात्मा गांधी पर लिखा।वे सच्चे गांधीवादी थे।विचार से और व्यवहार से।उन्होंने गांधी जी की अंतिम जेल यात्रा नाम से एक पुस्तक लिखी।यह पुस्तक अपने आप में दस्तावेज़ है।इसके अलावा उन्होंने क़रीब दो दर्ज़न लघु शोध आलेख लिखे।हिंदी पत्रकारिता में यह आलेख धरोहर से कम नहीं हैं। चूँकि महात्मा गांधी स्वयं भी एक निर्भीक और निष्पक्ष संपादक थे,इसलिए वही गुण माथुर जी ने अपनाए।श्री बादल ने याद किया कि उन्होंने चौदह साल तक माथुर जी के साथ रहते हुए क्या क्या सीखा ? डॉ. सुधीर सक्सेना ने कहा कि माथुर साहब उस दौर की भारतीय पत्रकारिता के महानायक थे।महात्मा गांधी से बड़ा पत्रकार भारत में कोई नहीं हुआ है। गांधी पहले नायक थे। उन्होंने कहा कि सब कहते हैं कि ईश्वर सत्य है और मैं कहता हूँ कि सत्य ही ईश्वर है।महात्मा गांधी के बाद पत्रकारिता में सत्य की प्रतिष्ठा के लिए राजेंद्र माथुर हमेशा याद किए जाएंगे।
उमेश त्रिवेदी ने कहा कि असली बात तो ” द मेकिंग ऑफ राजेंद्र माथुर ” प्रक्रिया पर होनी चाहिए।मालवा के एक छोटे से क़स्बे बदनावर से निकला एक बच्चा यूँ ही नहीं राजेंद्र माथुर बन जाता।उन्होंने याद किया कि बात-बात पर चुटकियां लेने वाले रज्जू बाबू आपातकाल के उन 19 महीनों में खामोशी में डूबे गुमसुम और खोए हुए नजर आते थे।उनसे मिलने-जुलने वालों का दायरा सिमटता चला गया था क्योंकि वे साहस के साथ सच बोलते और लिखते थे।इस बात ने उन्हें बहुत आहत किया था कि समाज उस कालखंड के दरम्यान बदल गया था।
आचरण में इंसानियत
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परिसंवाद के मुख्यवक्ता प्रकाश हिंदुस्तानी ने राजेश बादल को बधाई देते हुए कहा,”आपके प्रताप से,राजेंद्र माथुर के प्रताप से,महात्मा गांधी के आशीर्वाद से आज यहां 20 साल के नौजवान नैवेद्य पुरोहित हैं और 83 साल के ओम प्रकाश मेहता भी।” उन्होंने बेबाकी से कहा, ” कई बार मैं मजाक में कहता हूं कि माथुर साहब ने मेरी और मुझ जैसे कई लोगों की जिंदगी तबाह कर दी। तबाह इसलिए क्योंकि उन्होंने सिखाया ही नहीं कि दलाली कैसे की जाती है। चापलूसी कैसे की जाती है। धंधा कैसे किया जाता है। वे यही सिखाते रहे कि अच्छा अखबार कैसे निकालो, पाठकों से कैसे जुड़ो, अच्छी फोटो का चयन कैसे करो, अपनी भाषा कैसे सुधारो,किस तरह सही मुद्दे तलाशो।उन्होंने कटाक्ष किया, “आजकल मध्यप्रदेश और दिल्ली की सरकार पत्रकारों को भाव ही नहीं देती,कोई तवज्जो ही नहीं है।पत्रकारों को,तवज्जो उनको मिल रही है जो दलाली करते हैं ,नाच गाना करते है,मदारी का काम करते है।कोई मदारी कितनी ही बड़ी भीड़ जुटा ले,वह मदारी ही रहता है।गांधी जी के अखबार ज्यादा नहीं बिकते थे।लाखों में नहीं बिकते थे,लेकिन जो वह लिखते थे,वह समाज को बदलने के लिए काफी था।” गांधी के बारे में उन्होंने कहा कि नैतिकता के मामले में गांधी का कद हमारे कई देवताओं से भी ऊंचा है।गांधी धार्मिक थे, पर उनकी धार्मिकता कभी राजनीतिक पहचान या आक्रामकता नहीं बनी। उनके लिए धर्म अर्थात सत्य,अहिंसा, करुणा और नैतिक जिम्मेदारी, नैतिक बल यह गांधी जी का धर्म है। उनका धर्म एक मनुष्य को दूसरे के ख़िलाफ़ खड़ा करने का नहीं था।राजेंद्र माथुर भी यही कहते थे। माथुर जी ने गांधी जी को कभी मूर्ति नहीं माना बल्कि बहस का विषय बनाया कि गांधी ने यह कहा तो यह क्यों सही था ? क्यों गलत था ?
शीर्षक इतिहास बना
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विदिशा के पूर्व सांसद प्रतापभानु शर्मा ने एक किस्सा साझा किया।सन 1980 के चुनाव में जब वे पहली बार विदिशा से कांग्रेस उम्मीदवार बने, तो नई दुनिया में माथुर साहब का एक आलेख प्रकाशित हुआ। शीर्षक था – भाजपा के गढ़ में युवा कांग्रेसी। इसने उनके संसदीय क्षेत्र में जबरदस्त असर डाला था। उन्होंने माथुर साब को दिल्ली में भोजन पर आमंत्रित करने का प्रसंग भी सुनाया,जिसमें माथुर साहब ने कहा था, ” मैं होटल में नहीं,आपके घर में भोजन करूंगा “। राजेश सिरोठिया ने माथुर साहब की वह सीख याद की जो उनके पत्रकारिता जीवन की दिशा बन गई किशब्दानुवाद नहीं,भावानुवाद होना चाहिए। उन्होंने माथुर साहब से पूछा था कि आदर्श संपादक कौन है ? इस पर माथुर साहब का उत्तर था, ” वही,जिसे अपने अधीनस्थ सहयोगी से डर नहीं लगता।
राजेंद्र माथुर जैसा लिखें
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मुख्य अतिथि प्रकाश दुबे ने पद्मश्री विजय दत्त श्रीधर को दैनिक भास्कर का वह अंक भेंट किया ,जिसमें राजेंद्र माथुर साहब का 19 अक्टूबर 1969 का लेख छपा था।यह इतना प्रासंगिक है कि पढ़ने वाला समझता है कि यह आज ही लिखा गया है । उन्होंने राजेंद्र माथुर की पत्नी स्वर्गीय मोहिनी माथुर को श्रद्धांजलि देते हुए बताया कि वे अंग्रेजी और हिंदी, दोनों में उतनी ही निपुण थीं जितने राजेंद्र माथुर स्वयं, और उनके जाने के बाद भी वे गांधी पीस फाउंडेशन से जुड़ी रहीं, चरखा चलाती रहीं, बच्चों को पढ़ाती रहीं। दुबे जी ने अपने भाषण का समापन एक दृढ़ स्वर में किया, ” कोशिश करे अगर राजेंद्र माथुर जैसे चार वाक्य हम लिख ले तो हमें ये मानना चाहिए कि हां सचमुच हम राजेंद्र माथुर को याद करते हैं। उनका आदर करते है। कम से कम राजेंद्र माथुर उपहास के पात्र नहीं हैं। यह साबित करने की कोशिश कीजिएगा।
तीन अधूरे सपने
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अध्यक्षीय भाषण में पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर ने माथुर जी की तीन अधूरी ख्वाहिशों की चर्चा की।एक- हिंदी में सजग पाठक वर्ग तैयार करना, जहां समाचार-पत्र पाठक का हो और पाठक समाचार-पत्र का। दूसरी- एक ऐसा हिंदी का समाचार-पत्र जो सर्वांगीण हो,जिसमें पूरा देश बोले और तीसरी- सबसे महत्वपूर्ण विकेंद्रीकरण यानी जहां हर जिले का अपना अखबार हो,हर अखबार की अपनी आवाज हो,जो राज्य की राजधानी में सुनी जाए और देश की राजधानी में भी।श्रीधर जी ने कहा कि इन अधूरी कल्पनाओं के कारणों की समीक्षा भी उतनी ही जरूरी है, ताकि समाज को पता चले कि कहां चूक हुई। कार्यक्रम के समापन पर आयोजकों ने स्वर्गीय मोहिनी माथुर तथा रवींद्रनाथ टैगोर की भी कल पुण्यतिथि थी उनको एक मिनट के मौन के साथ श्रद्धांजलि दी। गांधी भवन न्यास के सचिव सभागार से बाहर निकलते लोगों के चेहरों पर एक ही भाव था मानो कुछ देर के लिए वे अपने रज्जू बाबू से संवाद करके फिर लौट आए हैं,
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार, लेखक, शिक्षाविद् एवं नागरिक उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन गांधी भवन न्यास के कोषाध्यक्ष, लेखक एवं पत्रकार श्री राजेश बादल ने किया। गांधी भवन न्यास के सचिव अंकित कुमार मिश्रा नेआभार माना।


