त्रिकोणिय मुकाबले में पलट सकती है बाजी, दतिया में बदलेंगे समीकरण

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TIO खास खबर

मध्यप्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर होने वाला उपचुनाव अब केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर नहीं रह गया है। पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर भाजपा द्वारा आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाए जाने के बाद चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं। और भाजपा की स्थिति भी बदल गई है। इसके पीछे चाहे अनचाहे लोगों का गुस्सा और शक्ति के रूप में नरोत्तम का उभरना भाजपा के लिए नुकसानदायक साबित हो रहा है। आजाद समाज पार्टी के दामोदर यादव की मौजूदगी ने मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की संभावना बढ़ा दी है। दामोदर यादव भले जीत के प्रबल दावेदार न हों, लेकिन वे इतने वोट जरूर प्रभावित कर सकते हैं कि किसी भी दल की जीत-हार के पीछे की वजह बन सकते है। दतिया में जातिगत और सामाजिक समीकरणों पर भी कार्य चालू हो गया है। इस सीट पर चुनावी नतीजे केवल लहर से नहीं, बल्कि उम्मीदवार के किए गए कार्यों और व्यवहार से तय होते है। साथ ही साथ बूथ स्तर के जातीय संतुलन से तय होते हैं। ऐसे में हर दल अपनी रणनीति इन्हीं समीकरणों के आधार पर तैयार कर रहा है। करीब 2.40 लाख मतदाताओं वाली दतिया विधानसभा सीट में ब्राह्मण और जाटव मतदाता लगभग बराबर संख्या में हैं। इसके अलावा कुशवाह, यादव और लोधी समाज निर्णायक भूमिका में हैं। क्षेत्र में प्रमुख जातीय वोट बैंक में ब्राह्मण 33-35 हजार (करीब 14.8 प्रतिशत), अहिरवार-जाटव 33-40 हजार, कुशवाह-काछी 20-30 हजार (करीब 12.2 प्रतिशत),यादव 14-18 हजार (करीब 7.4 प्रतिशत),लोधी लगभग 16 हजार (करीब 6.9 प्रतिशत क्षत्रिय 14-18 हजार वैश्य 7-8 हजार और अन्य पिछड़ा वर्ग 15-20 हजार हैं। इसी सामाजिक संरचना के कारण दतिया में उम्मीदवार का चेहरा जितना महत्वपूर्ण होता है, उससे कहीं अधिक उसकी जातीय स्वीकार्यता मायने रखती है। भाजपा को पिछले चुनाव से बहुत कुछ सीखने को मिला है। उम्मीदवार अगर मुंहफट है और पार्टी से ऊपर उठने की कोशिश कर रहा है तो उसे जमीन पर कैसे लाया जाता है ये भाजपा अच्छी तरह जानती है। बस यही भाजपा ने करके दिखा दिया। भाजपा के रणनीतिकार मानते हैं कि वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में डॉ. नरोत्तम मिश्रा की हार के पीछे केवल सत्ता विरोधी माहौल नहीं था, बल्कि पार्टी का पारंपरिक सामाजिक समीकरण भी कमजोर पड़ा था। ब्राह्मण, वैश्य और कुशवाह समाज के वोटों में अपेक्षित समर्थन नहीं मिलने से भाजपा को नुकसान उठाना पड़ा। यही कारण है कि इस बार भाजपा ने उम्मीदवार बदलने के साथ-साथ पूरे चुनावी प्रबंधन को नए सिरे से तैयार किया है। पार्टी की पहली प्राथमिकता ब्राह्मण मतदाताओं को फिर से एकजुट करना है, जबकि दूसरी रणनीति अनुसूचित जाति के मतदाताओं में कांग्रेस और आजाद समाज पार्टी की संभावित सेंध को रोकना है। इसके लिए संगठन और सरकार दोनों स्तरों के वरिष्ठ नेताओं को मैदान में उतार दिया गया है।

दामोदर यादव क्यों बन रहे हैं बड़ा फैक्टर?
आजाद समाज पार्टी के दामोदर यादव इस चुनाव की सबसे बड़ी राजनीतिक पहेली बनते दिखाई दे रहे हैं। यादव समाज में उनकी पकड़ और बहुजन राजनीति के साथ उनकी सक्रियता उन्हें एक प्रभावी उम्मीदवार बनाती है। यदि वे यादव, कुछ ओबीसी वर्गों और दलित मतदाताओं का हिस्सा अपनी ओर आकर्षित करने में सफल रहे तो मुकाबला पूरी तरह त्रिकोणीय हो सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे हालात में दामोदर यादव स्वयं जीतें या नहीं, लेकिन दोनों प्रमुख दलों का चुनावी गणित जरूर बिगाड़ सकते हैं। विशेष रूप से कांग्रेस और भाजपा के बीच कम अंतर की स्थिति में उनके खाते में जाने वाला प्रत्येक वोट निर्णायक साबित हो सकता है।
कांग्रेस के लिए भी राह आसान नहीं : कांग्रेस की आपसी गुटबाजी के चलते रास्ता आसान नहीं होगा। हालांकि कुछ संतुलन बिठाने की कोशिश की है। और मुकाबला दिलचस्प होता जा रहा है। आने वाले दिनों में नई नई बातें खुलकर सामने आएगी। टकराव के साथ नेताओं की पोल पट्टी भी खुब खुलेगी। भाजपा की रणनीति का जवाब देने के लिए कांग्रेस ने भी अपने अनुभवी नेताओं को जातीय आधार पर जिम्मेदारियां सौंपी हैं। फूल सिंह बरैया को अनुसूचित जाति मतदाताओं के बीच सक्रिय किया गया है। सिद्धार्थ कुशवाहा और अन्य ओबीसी वर्गों में पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने में जुटेंगे। कांग्रेस प्रत्याशी घनश्याम सिंह स्वयं क्षत्रिय समाज से आते हैं, जिससे उस वर्ग में पार्टी को लाभ मिलने की उम्मीद है। लाखन सिंह यादव को यादव समाज में प्रभाव बढ़ाने की जिम्मेदारी दी गई है। कांग्रेस की कोशिश यह भी है कि भाजपा द्वारा डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटे जाने को ब्राह्मण समाज के सम्मान से जोडक़र राजनीतिक लाभ लिया जाए। हालांकि डॉ. मिश्रा स्वयं भाजपा प्रत्याशी के समर्थन में लगातार सक्रिय हैं, जिससे कांग्रेस की यह रणनीति आसान नहीं दिखाई देती। भाजपा अपनी पूरी ताकत झोंकने में लगा हुआ है। पर नरोत्तम मिश्रा ने जो रायता फैला दिया है उसे समेटना आसान नहीं है। अगर चुनाव भाजपा जीती तो नरोत्तम की राजनीति यही समाप्त। और हारी तब भी नरोत्तम को ही भारी खामियाजा भुगतना पड़ेगा।